Zakat ka Paisa Kaha Kharch Kare: रमजान का पाक महीना चल रहा है और इस महीने में मुसलमान पूरे 29-30 रोजे रखते हैं. इस्लाम में इस महीने की बेहद खास अहमियत बताई गई है, क्योंकि इसी पाक महीने में कुरान की आयतें पैगंबर मुहम्मद साहब पर नाजिल हुई थीं. इसी वजह से रमजान की अहमियत और भी ज्यादा बढ़ जाती है. रमजान के मुकद्दस महीने में मुसलमान रोजा रखते हैं, अल्लाह की ज्यादा से ज्यादा इबादत करते हैं, तरावीह की नमाज पढ़ते हैं और कुरान की तिलावत करते हैं. इन सभी के अलावा एक चीज और है, जिसे मुसलमान इस महीने में अदा करते हैं और वो जकात है. जकात इस्लाम धर्म के पांच बिनायदी स्तंभ (अरकान) में से एक है.
जिस तरह रोजा, नमाज और हज मुसलमान पर फर्ज है, ठीक उसी तरह जकात को भी हर मुसलमान पर फर्ज बताया गया है. कोई भी मुसलमान इसे किसी हालत में नहीं छोड़ सकता है. जकात अदा करने के लिए कुछ अहम शर्तें और कुछ कायदे होते हैं, जिन्हें ध्यान में रखकर ही जकात अदा की जाती है. जकात को लेकर मुसलमानों के जहन में कई सवाल होते हैं. अक्सर लोग जकात निकाल तो देते हैं, लेकिन इसे कहां खर्च करना है ये नहीं जानते. इस आर्टिकल में हम इस्लामिक स्कॉलर मुफ्ती सलाउद्दीन कासमी से जानेंगे जकात से जुड़े कुछ अहम सवाल और उनके जवाब.
जकात क्या है?उर्दू में ज़कात का मतलब पाकीजा करना, शुद्ध करना, सफाई तरक्की है. इस्लाम में, जकात वो जरूरी दान है, जो हर साहिब-ए-नसाब मुसलमान को अपनी सालाना बचत का ढाई प्रतिशत (2.5%) जरूरतमंदों को देना होता है. अब आप सोच रहे होंगे कि साहिब-ए-निसाब कौन होता है. तो साहिब-ए-निसाब वो मुसलमान है जिसके पास अपनी बुनियादी जरूरतों के अलावा, कर्ज से मुक्त, कम से कम साढ़े सात (7.5) तोला सोना या साढ़े बावन (52.5) तोला चांदी (या इनके बराबर नकद/व्यापारिक सामान) मौजूद हो और इस पर एक साल गुजर चुका हो. ऐसे शख्स पर जकात देना फर्ज (अनिवार्य) है.
जकात कब फर्ज हुई?जकात, हिजरत के बाद 2 हिजरी (624 ईस्वी) में मदीना में फर्ज हुई थी. 2 हिजरी में रज्जब के महीने में मदीना में पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के आने के लगभग 18 महीने बाद जकात का हुक्म आया और ये रमजान के रोजों से कुछ समय पहले अनिवार्य की गई. ये साहिब-ए-निसाब मुसलमानों पर साल में एक बार फर्ज होती है.

इस्लाम में जकात के तौर पर योग्य संपत्ति (जो एक साल से आपके पास हो और निसाब से अधिक हो) का 2.5% (ढाई प्रतिशत) देना फर्ज है, जो कुल संपत्ति का 40वां हिस्सा होता है. ये एक इस्लामिक ईयर में कम से कम 87.48 ग्राम सोना या 612.36 ग्राम चांदी के बराबर कीमत रखने वाले वयस्कों के लिए जरूरी है.
जकात किसे देनी चाहिए?जकात (Zakat) तब फर्ज होती है जब किसी मुसलमान व्यक्ति के पास निसाब (न्यूनतम सीमा, लगभग 87.48 ग्राम सोना या 612.36 ग्राम चांदी के बराबर धन) हो और वो धन उस पर एक पूरा इस्लामी साल (हाजरी) तक रहे. वो मुसलमान बालिग और समझदार होना चाहिए और उस धन पर कोई बकाया कर्ज न हो. ये सिर्फ अमीर मुसलमानों पर फर्ज है. इसे सालाना अदा किया जाता है, आमतौर पर रमजान के महीने में.
जकात फर्ज होने की शर्तें (Conditions for Zakat)जब आपकी संपत्ति एक पूरे इस्लामी साल तक निसाब सीमा से ज्यादा रहे, तो उस साल के आखिर आपको जकात निकालनी चाहिए. वैसे किसी भी महीने में जकात अदा की जा सकती है, लेकिन रमजान के महीने में जकात देना बेहतर और सवाब का काम माना गया है. जकात के दो प्रकार होते हैं जो नीचे बताए गए हैं-

इस्लाम की सबसे पाक किताब में ऐसे 8 लोग बताए गए हैं जो जकात के 8 हकदार हैं. कुरान (सूरह अत-तौबा 9:60) में इसका जिक्र मिलता है.