News India Live, Digital Desk: आज यानी 21 मार्च 2026 को ईद-उल-फितर (मीठी ईद) का त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। रमजान के 30 मुकद्दर रोजों के बाद अल्लाह की इबादत का यह इनाम है। इस्लाम में ईद की खुशियों को केवल अपनों तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि समाज के गरीब और जरूरतमंद तबके को भी इसमें शामिल करने का सख्त निर्देश है। यही वजह है कि ईद की नमाज से पहले 'जकात' और 'फितरा' अदा करना हर सक्षम मुसलमान पर फर्ज (अनिवार्य) माना गया है।फितरा (Sadaqah-al-Fitr): खुशियों में सबको शामिल करने का जरियाफितरा वह अनिवार्य दान है जो ईद की नमाज से पहले दिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी गरीब व्यक्ति ईद के दिन भूखा न रहे और वह भी नए कपड़े व पकवानों के साथ त्योहार मना सके।कितना देना होता है: फितरा प्रति व्यक्ति लगभग सवा दो किलो (2.175 kg) गेहूं, जौ, खजूर या किशमिश के मूल्य के बराबर होता है। 2026 के बाजार भाव के अनुसार, विभिन्न कमेटियों ने इसकी न्यूनतम राशि तय की है।कौन देता है: घर का मुखिया अपने परिवार के हर सदस्य (छोटे बच्चों और बुजुर्गों सहित) की ओर से फितरा अदा करता है।समय: इसे रमजान के आखिरी दिनों में या ईद की नमाज के लिए ईदगाह जाने से पहले देना सबसे उत्तम माना गया है।जकात (Zakat): अपनी बचत का ढाई प्रतिशत हिस्साजकात इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है। यह सालभर की बचत और संपत्ति पर दिया जाने वाला दान है।नियम: यदि किसी व्यक्ति के पास अपनी जरूरतों को पूरा करने के बाद एक 'निश्चित मात्रा' (नसाब) से अधिक संपत्ति (सोना, चांदी या नकदी) एक साल तक रहती है, तो उसे उसकी कुल कीमत का 2.5 प्रतिशत (ढाई प्रतिशत) हिस्सा गरीबों को देना अनिवार्य है।महत्व: जकात का अर्थ है 'शुद्ध करना'। माना जाता है कि जकात देने से इंसान की दौलत पाक हो जाती है और समाज में आर्थिक संतुलन बना रहता है।जकात और फितरा में क्या है मुख्य अंतर?अक्सर लोग इन दोनों के बीच भ्रमित हो जाते हैं, जबकि दोनों के नियम अलग हैं:अनिवार्यता: जकात केवल उन पर फर्ज है जिनकी संपत्ति 'नसाब' (साढ़े बावन तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोना) के बराबर हो। जबकि फितरा हर उस व्यक्ति पर वाजिब है जिसके पास ईद के दिन अपनी जरूरत से ज्यादा राशन या संपत्ति मौजूद हो।समय: जकात साल में कभी भी दी जा सकती है (अक्सर लोग रमजान में देते हैं), लेकिन फितरा सिर्फ रमजान के अंत और ईद की नमाज से पहले ही दिया जाता है।उद्देश्य: जकात दीर्घकालिक गरीबी दूर करने के लिए है, जबकि फितरा ईद की तात्कालिक खुशियां बांटने के लिए है।किन लोगों को दिया जा सकता है यह दान?इस्लामी शरीयत के अनुसार, जकात और फितरा का पैसा केवल उन्हीं को दिया जा सकता है जो इसके हकदार हों। इनमें गरीब, यतीम (अनाथ), विधवाएं, कर्ज में डूबे लोग और मुसाफिर शामिल हैं। अपने माता-पिता, दादा-दादी या औलाद को यह पैसा नहीं दिया जा सकता। आधुनिक दौर में कई लोग इसे चैरिटी संस्थानों, अस्पतालों और मदरसों में भी जमा कराते हैं ताकि सामूहिक रूप से जरूरतमंदों की मदद हो सके।