पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की तपिश अब भारत की रसोई तक पहुंचती दिख रही है। इजरायल और खाड़ी देशों के बीच बढ़ते तनाव का असर कच्चे तेल के साथ-साथ एलपीजी (LPG) की सप्लाई पर भी पड़ने लगा है। हालात इतने गंभीर होते जा रहे हैं कि देश में गैस की संभावित किल्लत से निपटने के लिए सरकार और ऑयल मार्केटिंग कंपनियां एक चौंकाने वाले विकल्प पर विचार कर रही हैं। दरअसल, चर्चा है कि घरेलू इस्तेमाल वाले 14.2 किलो के गैस सिलेंडर का वजन घटाकर 10 किलो किया जा सकता है।
इस बड़े बदलाव के पीछे का तर्क सीधा है—सीमित स्टॉक को ज्यादा से ज्यादा घरों तक पहुंचाना। माना जा रहा है कि अगर गैस की मात्रा कम की जाती है, तो मौजूदा भंडार से अधिक परिवारों की जरूरतें पूरी की जा सकेंगी। हालांकि, यह अभी एक प्रस्ताव है जिस पर विचार चल रहा है, लेकिन सप्लाई चेन की मौजूदा स्थिति को देखते हुए इसे लागू करने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
आखिर क्यों सिलेंडर का वजन घटाने की तैयारी में है सरकार?सूत्रों के अनुसार, ऑयल मार्केटिंग कंपनियां इस विकल्प को एक ‘इमरजेंसी प्लान’ के तौर पर देख रही हैं। असल में, 14.2 किलो का सिलेंडर एक औसत परिवार के लिए लगभग 35 से 40 दिन चलता है। विशेषज्ञों का मानना है कि संकट के समय अगर 10 किलो गैस वाला सिलेंडर दिया जाए, तो वह भी करीब एक महीने तक चल सकता है। इससे गैस की बर्बादी कम होगी और सप्लाई चेन पर दबाव घटेगा।
अगर यह फैसला लागू होता है, तो कंपनियों को बॉटलिंग प्लांट्स में बड़े तकनीकी बदलाव करने होंगे। साथ ही, उपभोक्ताओं को भ्रम से बचाने के लिए इन सिलेंडरों पर विशेष स्टिकर या मार्किंग लगाई जाएगी ताकि उन्हें पता रहे कि वे कम वजन की गैस ले रहे हैं। जाहिर है, वजन कम होने पर सिलेंडर की कीमतों में भी उसी अनुपात में कटौती की जाएगी।
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में फंसे गैस टैंकरभारत अपनी जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत एलपीजी आयात करता है और इसमें से बड़ी हिस्सेदारी खाड़ी देशों की होती है। मौजूदा संकट की सबसे बड़ी वजह ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ में उपजा तनाव है, जहां से भारत के अधिकांश गैस टैंकर गुजरते हैं। बताया जा रहा है कि कई टैंकर वहां फंसे हुए हैं, जिससे सप्लाई शेड्यूल पूरी तरह बिगड़ गया है।
आंकड़े बताते हैं कि भारत में रोजाना करीब 93,500 टन एलपीजी की खपत होती है, जिसमें से अकेले घरेलू उपभोक्ताओं को 80,400 टन गैस चाहिए। हाल ही में आए दो जहाजों में करीब 92,700 टन गैस आई है, जो देश की सिर्फ एक दिन की जरूरत के बराबर है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्टॉक को लेकर दबाव कितना अधिक है। मार्च के पहले पखवाड़े में गैस की खपत में 17 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जो इस संकट की आहट दे रही है।
संसद में पीएम मोदी का भरोसा: घबराने की जरूरत नहींइस वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में देश को आश्वस्त किया है कि सरकार स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए है। पीएम मोदी ने लोकसभा में स्पष्ट किया कि भारत अब केवल 27 देशों पर निर्भर नहीं है, बल्कि हमने 41 देशों से ऊर्जा आयात शुरू कर दिया है। सरकार का पूरा जोर इस बात पर है कि आम आदमी की जेब और उसकी रसोई पर कम से कम असर पड़े।
प्रधानमंत्री ने रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Reserves) को 65 लाख मीट्रिक टन तक बढ़ाने की योजना का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है और बातचीत ही एकमात्र रास्ता है। सरकार ने एक हाई-लेवल टीम भी बनाई है जो रोजाना आयात-निर्यात और घरेलू स्टॉक की समीक्षा कर रही है ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कदम उठाए जा सकें।
फिलहाल, 10 किलो के सिलेंडर वाला प्रस्ताव चर्चा के स्तर पर है, लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता बनी रही, तो जल्द ही आपकी रसोई में आने वाला लाल सिलेंडर थोड़ा ‘हल्का’ हो सकता है। सरकार की प्राथमिकता यही है कि सिलेंडर महंगा करने के बजाय उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।