सर्वोच्च न्यायालय ने धर्म परिवर्तन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म मानने वाले लोगों तक ही सीमित है। यदि कोई व्यक्ति इन धर्मों को छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो उसे अनुसूचित जाति का लाभ नहीं मिलेगा।
यह निर्णय न्यायमूर्ति पी. के. मिश्रा और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने सुनाया। अदालत ने कहा कि संविधान के प्रावधानों के अनुसार अनुसूचित जाति से जुड़े अधिकार निर्धारित धार्मिक दायरे के भीतर ही लागू होते हैं। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति ईसाई या किसी अन्य धर्म को अपनाकर उसका पालन करता है, तो वह अनुसूचित जाति से जुड़े विशेष अधिकारों का हकदार नहीं रहेगा।
न्यायालय ने अपने निर्णय में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के पहले दिए गए फैसले को भी सही ठहराया। उच्च न्यायालय ने कहा था कि धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति की पहचान और उससे जुड़े कानूनी संरक्षण बनाए नहीं रखे जा सकते।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति की सामाजिक और धार्मिक पहचान बदल जाती है, जिसका सीधा प्रभाव उसकी कानूनी स्थिति पर पड़ता है। इसी आधार पर न्यायालय ने कहा कि अनुसूचित जाति से जुड़े विशेष अधिकार और संरक्षण, जैसे अत्याचार निवारण कानून के तहत मिलने वाले लाभ, धर्म परिवर्तन के बाद स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
इस निर्णय को उन मामलों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनमें धर्म परिवर्तन के बाद भी अनुसूचित जाति के अधिकारों का दावा किया जाता रहा है। इस फैसले से अब इस विषय पर कानूनी स्थिति और अधिक स्पष्ट हो गई है और भविष्य के मामलों में इससे मार्गदर्शन मिलेगा।