सहदेवी: एक चमत्कारी औषधीय पौधा और इसके अद्भुत लाभ
Gyanhigyan April 08, 2026 09:42 AM
सहदेवी का परिचय

सहदेवी, जिसे अश फ्लीबेन भी कहा जाता है, एक नाजुक पौधा है जिसकी ऊँचाई एक से साढ़े तीन फुट तक होती है। यह पौधा भले ही कोमल हो, लेकिन तंत्र शास्त्र और आयुर्वेद में इसकी महत्ता किसी महारथी से कम नहीं है। इसके अद्भुत गुणों के कारण इसे देवी का दर्जा प्राप्त है। सहदेवी की पत्तियाँ तुलसी और पोदिना की पत्तियों के समान पतली होती हैं, और इसके सफेद फूल होते हैं। यह पौधा मुख्यतः बलुई मिट्टी में पाया जाता है।


संस्कृत में इसे महबला, सहदेवी, सहदेवा, और अन्य नामों से जाना जाता है। हिंदी में इसे सहदेवी, सदोई, और सदोडी कहा जाता है।


सहदेवी के उपयोग और लाभ

प्रमुख अंग: मूल, पुष्प, बीज और पंचांग। स्वाद: तीखा। गुण: स्वेदजन्न, कृमिघ्र, शोथघ्र। उपयोग: जलोधर और विषम ज्वर में सहायक।


सहदेवी के 36 अद्भुत लाभ:



  • ज्वर में पसीना लाने के लिए इसका काढ़ा या स्वरस दिया जाता है।

  • बिस्फोटक में सहदेई के पंचांग का लेप करने से सभी प्रकार के विस्फोटकों का नाश होता है।

  • मूत्रदाह रोग में इसका स्वरस दिया जाता है।

  • कृमि रोग में इसके बीज का शहद के साथ सेवन लाभकारी होता है।

  • अर्श (बवासीर) में इसके पंचांग से लाभ होता है।

  • सहदेई का मूल सर के पास रखकर सोने से अच्छी नींद आती है।

  • अश्मरी (पथरी) में इसके पत्तों का स्वरस लाभकारी होता है।

  • मुख रोग में इसके मूल का काढ़ा कुल्ला करने से लाभ होता है।

  • कुष्ट रोग में पीत पुष्प वाली सहदेई का स्वरस पीने से लाभ होता है।

  • सहदेवी की जड़ के टुकड़े कमर में बांधने से अतिसार रोग मिट जाता है।

  • बुखार होने पर इसे बच्चों को भी दिया जा सकता है।

  • रक्तदोष, खाज खुजली और त्वचा की सुंदरता के लिए सहदेवी का पाउडर लाभकारी है।

  • प्रसव-वेदना निवारक के लिए इसकी जड़ का लेप किया जाता है।

  • सहदेई के पत्ते का रस पीने से ज्वर और पथरी रोग दूर होते हैं।

  • इसकी जड़ का तेल में पीसकर घाव पर लगाने से घाव जल्दी ठीक होता है।

  • सहदेई का पंचांग पीने से रक्त प्रदर रोग दूर होता है।


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