अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का मंच एक बार फिर सज चुका है. अमेरिकी दल का नेतृत्व उप राष्ट्रपति जे डी वैंस कर रहे हैं जबकि ईरानी प्रतिनिधिमंडल को ईरानी संसद के स्पीकर. इस्लामाबाद में शनिवार से हो रही यह बातचीत कितने दिनों तक खिंचेगी यह किसी को नहीं पता. अमेरिकी राष्ट्रपति ने बातचीत शुरू होने से पहले सोशल मीडिया पर कहा है कि ईरान के पास अंतर्राष्ट्रीय जलमार्ग के नाम पर कुछ दिनों की वसूली के सिवाय कोई कार्ड नहीं है.
हार्ड निगोशिएटर के रूप में जाना जाता है ईरानदो हफ्ते के युद्धविराम के तहत 11 अप्रैल से पाकिस्तान में हो रही अमेरिकाईरान बातचीत को लेकर कूटनीतिक हलकों में एक बात साफ कही जा रही है कि ईरान से डील करना कभी आसान नहीं रहा और इस बार भी नहीं होगा. कारण सिर्फ मौजूदा भू-राजनीति नहीं, बल्कि ईरान की वह ऐतिहासिक और रणनीतिक नेगोशिएशन शैली है जिसने उसे दुनिया के सबसे ‘हार्ड नेगोशिएटर’ देशों में शामिल कर दिया है.
क्यों कठिन है ईरान से बातचीत?ईरान की नेगोशिएशन शैली तीन स्तंभों पर टिकी है. रणनीतिक धैर्य, वैचारिक दृढ़ता और बहु-स्तरीय दबाव बनाने की क्षमता. 1979 की ईरानियन रिवोल्यूशन के बाद बनी इस्लामिक रिपब्लिक ने यह साफ कर दिया कि वह पश्चिमी दबाव में झुकने के बजाय समय लेकर अपने शर्तों पर बातचीत करना पसंद करता है. ईरान अक्सर बातचीत को लंबा खींचता है. हर छोटे मुद्दे पर सौदेबाजी करता है. पब्लिक पोजिशन को सख्त रखता है, जबकि बैकचैनल में लचीलापन दिखाता है. बातचीत को लेकर ईरानी रणनीति का लंबा इतिहास रहा है. ईरान की यह शैली नई नहीं है.
सफवी साम्राज्य और तुर्क साम्राज्य के बीच 16वीं17वीं सदी में दशकों तक चला संघर्ष इसका उदाहरण है. इसमें तीन महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए थे:
1514: चल्दिरान का युद्ध
1555: अमास्या संधि
1639: Treaty of Zuhab
इन घटनाओं ने ईरान को सिखाया कि युद्ध और बातचीत साथ-साथ चल सकते हैं और अंतिम परिणाम धैर्य से निकलता है.
अमेरिका के साथ डील का इतिहासईरान और अमेरिका के बीच सबसे बड़ा समझौता 2015 में हुआ. Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) ओबामा प्रशासन के दौरान हुआ था. ईरान ने परमाणु कार्यक्रम सीमित करने पर सहमति दी थी. बदले में ईरान को प्रतिबंधों में राहत मिली थी. लेकिन 2018 में डोनाल्ड ट्रंप ने इस डील से अमेरिका को बाहर निकाल लिया. इसके बाद ईरान ने धीरे-धीरे अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर बढ़ाया. दोनों देशों के बीच विश्वास का संकट और गहरा हुआ.
ईरान की खास नेगोशिएशन विशेषताएं1.Time is a weapon समय को हथियार की तरह इस्तेमाल
2.Maximum leverage क्षेत्रीय प्रभाव (Iraq, Syria, proxies) का उपयोग
3.Layered diplomacy खुली बातचीत + गुप्त चैनल
4.Ideological positioning पब्लिक में सख्त रुख, अंदर लचीलापन
11 अप्रैल की बातचीत में क्या होगा?पाकिस्तान में हो रही यह बैठक एक नए बैकचैनल की तरह देखी जा रही है, लेकिन चुनौतियां कई हैं.
गहरा अविश्वासक्षेत्रीय तनाव (IsraelIran dynamics)
प्रतिबंध और आर्थिक दबाव
क्या ट्रंप के लिए संभव है डील?
डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह डील करना आसान नहीं होगा, लेकिन असंभव भी नहीं. ट्रंप out-of-the-box डीलमेकर माने जाते हैं. वे unconventional diplomacy अपनाते हैं.राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर दबाव बनाते हुए अभी भी अपने एयरक्राफ्ट कैरियर और सेना के साथ ईरान की घेराबंदी जारी रखी है.
ट्रंप के लिए बड़ी बाधाएंईरान कोई सामान्य नेगोशिएटर नहीं, बल्कि एक सिविलाइजेशनल प्लेयर’ है. जो इतिहास, धैर्य और रणनीति के मिश्रण से चलता है. इस्लामाबाद की बातचीत में असली सवाल यह नहीं है कि ‘डील होगी या नहीं’ बल्कि यह है कि ‘किसकी शर्तों पर होगी. इतिहास यही कहता है कि ईरान जल्दी झुकता नहीं, बल्कि धीरे-धीरे खेल जीतता है.