डीएनए टेस्ट से पितृत्व साबित न होने पर Supreme Court ने बच्चे के लिए भरण-पोषण देने से किया इनकार
Indias News Hindi April 22, 2026 07:43 PM

New Delhi, 22 अप्रैल . Supreme Court ने एक महिला की उस अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने अपनी नाबालिग बेटी के लिए भरण-पोषण की मांग की थी.

यह फैसला तब आया जब डीएनए जांच में यह स्पष्ट हो गया कि जिस व्यक्ति को प्रतिवादी बताया गया था, वह बच्ची का जैविक पिता नहीं है. अदालत ने कहा कि ऐसे वैज्ञानिक सबूत कानून में मानी जाने वाली वैधता की धारणा से अधिक मजबूत होते हैं.

यह फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की पीठ ने सुनाया. महिला ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी. जिसमें बच्ची के भरण-पोषण से इनकार कर दिया गया था, हालांकि महिला के अपने भरण-पोषण के दावे पर दोबारा विचार करने के लिए कहा गया था.

मामले की पृष्ठभूमि में महिला ने आरोप लगाया था कि जिस व्यक्ति के यहां वह घरेलू सहायिका के रूप में काम करती थी, उसने शादी का झांसा देकर उसके साथ संबंध बनाए थे. बाद में वर्ष 2016 में दोनों ने शादी कर ली और अगले महीने एक बच्ची का जन्म हुआ. कुछ समय बाद दोनों के रिश्तों में विवाद बढ़ने लगा और मामला अदालत तक पहुंच गया.

सुनवाई के दौरान प्रतिवादी ने खुद को बच्ची का पिता मानने से इनकार कर दिया और डीएनए जांच की मांग की. अदालत ने यह मांग स्वीकार कर ली. जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि वह व्यक्ति बच्ची का जैविक पिता नहीं है. इसी आधार पर निचली अदालत ने बच्ची के भरण-पोषण की याचिका खारिज कर दी थी. बाद में अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट ने भी इसी फैसले को सही माना.

Supreme Court में मुख्य बहस इस बात पर केंद्रित थी कि कानून में यह माना जाता है कि विवाह के दौरान जन्मा बच्चा पति का ही होता है, जब तक इसके विपरीत साबित न हो जाए. हालांकि अदालत ने कहा कि जब वैज्ञानिक प्रमाण स्पष्ट रूप से सच्चाई दिखा देते हैं, तो इस कानूनी अनुमान को लागू नहीं किया जा सकता.

अदालत ने यह भी कहा कि यह कानूनी व्यवस्था बच्चों को सामाजिक कलंक से बचाने के लिए बनाई गई है लेकिन ठोस वैज्ञानिक सबूतों के सामने इसका दायरा सीमित हो जाता है.

जस्टिस करोल की अध्यक्षता वाली Supreme Court की पीठ ने कहा कि कानून बनाने वालों का उद्देश्य स्पष्ट है. टेक्नोलॉजी में काफी प्रगति होने के बावजूद, यह कानूनी धारणा इसलिए बनाई गई है ताकि किसी भी बच्चे को “अवैध” कहे जाने के कलंक से बचाया जा सके.

Supreme Court ने आगे कहा कि जब ठोस और वैज्ञानिक सबूत मौजूद हों, तो उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अदालत ने पहले दिए गए फैसलों का हवाला देते हुए यह भी कहा कि जब कानून के आधार पर मानी जाने वाली धारणा और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्यों के बीच टकराव होता है, तो वैज्ञानिक सबूतों को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए.

अपने आदेश में अदालत ने यह भी दर्ज किया कि इस मामले में डीएनए जांच दोनों पक्षों की सहमति से कराई गई थी और बाद में उस पर कोई विवाद नहीं किया गया. अदालत ने कहा कि इस स्थिति में यह निष्कर्ष अंतिम हो चुका है.

इसी आधार पर Supreme Court ने माना कि दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा बच्ची के भरण-पोषण से इनकार करना सही था और महिला की अपील को बिना आधार वाली यानी निराधार बताया. हालांकि, अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि इस पूरे विवाद का असर बच्चे पर पड़ा है और उसकी भलाई को प्राथमिकता देना जरूरी है.

Supreme Court ने निर्देश दिया कि दिल्ली Government का महिला एवं बाल विकास विभाग बच्चे की स्थिति की जांच करे. इसके लिए एक अधिकारी को बच्चे के घर भेजकर उसके जीवन की स्थिति का आकलन करने को कहा गया, जिसमें उसकी पढ़ाई, भोजन, स्वास्थ्य और जीवन की बुनियादी जरूरतों की उपलब्धता शामिल हो.

अदालत ने यह भी कहा कि यदि जांच में बच्चे की स्थिति में कोई कमी पाई जाती है, तो विभाग को तुरंत आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए.

अंत में Supreme Court ने यह भी स्पष्ट किया कि महिला को दिए जाने वाले भरण-पोषण के मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही निचली अदालत को दोबारा विचार करने के लिए भेज चुका है, इसलिए इस अपील को खारिज कर दिया गया.

पीएम

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