सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश की धीरेंद्र शास्त्री से मुलाकात पर विवाद
newzfatafat April 22, 2026 09:42 PM

सोमवार को, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई ने बागेश्वर धाम के प्रमुख पंडित धीरेंद्र शास्त्री से अपने परिवार के साथ एक निजी मुलाकात की। इस मुलाकात की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होते ही, विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई वरिष्ठ वकीलों और कानूनी विशेषज्ञों ने इसे न्यायपालिका की गरिमा से जोड़ा और चिंता व्यक्त की, जबकि कुछ ने इसे व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा माना।


संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल

इस मामले का मुख्य मुद्दा केवल एक मुलाकात नहीं है, बल्कि इसके पीछे की प्रतीकात्मकता भी है। आलोचकों का कहना है कि जब सर्वोच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश किसी विवादित धार्मिक व्यक्ति के साथ सार्वजनिक रूप से दिखाई देता है, तो इससे संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इस मुद्दे को उठाते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि ऐसी तस्वीरें न्यायपालिका की छवि को प्रभावित कर सकती हैं। उनके अनुसार, यह केवल व्यक्तिगत आस्था का मामला नहीं है, बल्कि सार्वजनिक पद की जिम्मेदारी से भी जुड़ा है।


प्रशांत भूषण का तीखा हमला

प्रशांत भूषण ने इस मुलाकात पर एक्स पर लिखा, 'उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा है।' उन्होंने सवाल उठाया कि एक विवादित कथावाचक के साथ सार्वजनिक रूप से दिखकर जस्टिस गवई न्यायपालिका और देश को क्या संदेश देना चाहते हैं। भूषण ने धीरेंद्र शास्त्री को 'नफरत फैलाने वाला' बताते हुए इस मुलाकात को न्यायिक मर्यादा के खिलाफ करार दिया।


धीरेंद्र शास्त्री का परिचय

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री मध्य प्रदेश के छतरपुर में बागेश्वर धाम के प्रमुख हैं और हाल के वर्षों में उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। उनके 'दिव्य दरबार' और चमत्कारों के दावों ने उन्हें लाखों लोगों के बीच प्रसिद्ध बना दिया है। हालांकि, उनके कई बयान विवादों में भी रहे हैं, जो सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर आधारित हैं। इस पृष्ठभूमि में, किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति की उनके साथ मुलाकात अक्सर चर्चा का विषय बन जाती है।


सोशल मीडिया पर बहस

तस्वीरें सामने आते ही, सोशल मीडिया पर दो स्पष्ट धड़े बन गए। एक पक्ष का कहना है कि हर व्यक्ति को अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार किसी से भी मिलने का अधिकार है, चाहे वह न्यायाधीश ही क्यों न हो। वहीं, दूसरा पक्ष इसे न्यायपालिका की निष्पक्षता से जोड़कर देख रहा है। उनका तर्क है कि उच्च पदों पर बैठे लोगों को अपने सार्वजनिक आचरण में अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। इस बहस में कई कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपनी राय रखी, जिससे मुद्दा और व्यापक हो गया।


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