ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम के लगभग एक महीने बाद, मध्य पूर्व में हालिया संघर्ष से जुड़ी नई जानकारियाँ सामने आई हैं। एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 40 दिनों तक चले सैन्य तनाव के दौरान, ईरानी हमलों ने कम से कम 16 अमेरिकी सैन्य ठिकानों को गंभीर नुकसान पहुँचाया है। ये ठिकाने आठ विभिन्न देशों में स्थित हैं, जिनमें कुवैत, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन और इराक शामिल हैं।
CNN द्वारा प्रकाशित एक जांच रिपोर्ट में बताया गया है कि कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए हमले इतने तीव्र और सटीक थे कि इससे पहले कभी इस स्तर का नुकसान नहीं हुआ। एक रक्षा विशेषज्ञ ने कहा कि इन हमलों में आधुनिक तकनीक का उपयोग किया गया, जिससे अमेरिकी सुरक्षा प्रणाली को बड़ा झटका लगा।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि ईरानी हमलों का मुख्य निशाना अमेरिका के महत्वपूर्ण सैन्य उपकरण और सिस्टम रहे। इनमें E3 सेंट्री सर्विलांस विमान शामिल है, जिसे खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका की 'आंख' माना जाता है। यह विमान सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर हुए हमले में नष्ट हो गया। इसके अलावा, कुवैत के कैंप आरिफजान में संचार उपकरण और जॉर्डन के साल्टी एयर बेस में रडार सिस्टम को भी भारी नुकसान पहुँचा है।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इस क्षेत्र में मौजूद रडार और निगरानी प्रणाली उनकी सबसे महंगी और महत्वपूर्ण संपत्तियों में से एक है, जो सैन्य गतिविधियों की निगरानी करती है। इन पर हुए हमले को रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कतर का अलउदीद एयर बेस, जो अमेरिकी कमांड सेंटर और वार रूम का स्थान है, भी हमलों का शिकार हुआ। इस बेस को दो अलग-अलग हमलों में निशाना बनाया गया। इसके अलावा, बहरीन की नेवल सपोर्ट फैसिलिटी और कुवैत का कैंप ब्यूहरिंग भी प्रभावित हुए।
रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण दावा किया गया है कि ईरान की इस सैन्य क्षमता के पीछे चीन से मिली तकनीकी मदद भी एक कारण हो सकती है। कहा गया है कि ईरान ने 2024 में चीन से एक उन्नत TEE014 सैटेलाइट हासिल किया, जिसने उसे अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सटीक निगरानी में मदद की।
यह सैटेलाइट तकनीक पहले की तुलना में काफी उन्नत बताई जा रही है, जिससे ईरान को क्षेत्र में अमेरिकी गतिविधियों पर बेहतर नजर रखने की क्षमता मिली। हालांकि, इस दावे की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। यह पूरा घटनाक्रम मध्य पूर्व में बदलते सैन्य संतुलन और तकनीकी प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है, जो भविष्य में वैश्विक सुरक्षा पर बड़ा असर डाल सकता है।