पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के पूरे अंतिम परिणाम भले ही नहीं आए हैं, लेकिन तस्वीर साफ हो गई है. पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल में नई सरकार बनने जा रही है. पुराने सूरमा फेल हो गए. चाहें ममता बनर्जी हों या एमके स्टालिन या फिर केरल के सीएम पी. विजयन. देश का ध्यान जब पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों पर था तो मतगणना शुरू होने के बाद तमिलनाडु से विजय थलपति नाम का एक सितारा उगता हुआ दिखाई पड़ा जो शाम होते-होते पूरे तमिलनाडु के क्षितिज पर छा गया, जिसने स्टालिन के सीएम बनने के सपने को चकनाचूर कर दिया.
तमिलनाडु और केरल, दोनों ही दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण राज्य हैं. यहां की राजनीति भी उतनी ही रोचक है. विधान सभा चुनावों की मतगणना शुरू होने के कुछ घंटों बाद तमिलनाडु एवं केरल के राजनीतिक घटनाक्रम में दो नाम तेजी से चर्चा उभरकर आए. तमिलनाडु में विजय थलपति और केरल में मुख्यमंत्री पी. विजयन. एक की शानदार जीत हुई तो दूसरे की वापसी पर फुलस्टॉप लग गया. आइए, समझते हैं कि तमिलनाडु में विजय थलपति की जीत के पांच बड़े कारण क्या रहे और केरल में पी. विजयन को किन वजहों से नुकसान हुआ?
तमिलनाडु में विजय थलपति की जीत के पांच बड़े कारण 1- मजबूत जनसंपर्क और लोकप्रियताविजय पहले से ही एक बड़े फिल्म स्टार हैं. उनकी छवि आम लोगों के बीच बहुत मजबूत है. लोग उन्हें अपना मानते हैं. उन्होंने अपनी लोकप्रियता को राजनीति में अच्छे से इस्तेमाल किया. उनके कार्यक्रमों में बड़ी भीड़ उमड़ी. इससे माहौल उनके पक्ष में बनता गया, जो बाद में मतपेटियों में वोट के रूप में कन्वर्ट हुआ.

विजय ने साल 2024 में जब राजनीतिक दल टीवीके की घोषणा की तो युवाओं को खास तौर पर टारगेट किया. उनकी रैलियों में युवा बड़ी संख्या में दिखते रहे. उन्होंने रोजगार, शिक्षा और अवसरों की बात की. सोशल मीडिया पर भी उनकी पकड़ मजबूत रही. इससे पहली बार वोट देने वाले युवाओं का झुकाव उनकी ओर हुआ.
3- साफ और नई राजनीति की छविविजय ने खुद को एक नए विकल्प के रूप में तमिलनाडु की जनता के सामने पेश किया. उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख दिखाया. जनता को लगा कि वे पुराने नेताओं से अलग हैं. यह भरोसा उनके लिए बड़ा प्लस पॉइंट बना. सत्तारूढ़ डीएमके हो या जयललिता की पार्टी एडीएमके, भ्रष्टाचार के आरोप इन दलों के नेताओं पर खूब-खूब लगे. कई तो जेल भी गए.
TVK की जश्न मनाते थलपति विजय के समर्थक.
4- जमीनी मुद्दों पर रहा फोकसविजय ने बड़े वायदों की जगह छोटे और जरूरी और जमीनी मुद्दों पर बात की. जैसे पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय समस्याएं. लोगों को लगा कि उनकी बात सुनी जा रही है. इससे जनता का भरोसा बढ़ा और उन्होंने आगे बढ़कर न केवल खुद वोट दिया बल्कि अपनों को भी प्रेरित किया.
थलपति विजय.
5- बनाई मजबूत प्रचार रणनीतिविजय की टीम ने प्रचार पर बहुत मेहनत की. रैलियां, डिजिटल कैंपेन और ग्राउंड लेवल पर काम किया गया. संदेश साफ और सीधा रखा गया. इससे वे ज्यादा लोगों तक पहुंचे और समर्थन वोट के रूप में मतपेटियों में जाकर गिरा और जब सुबह मतगणना शुरू हुई तो वही वोट विजय को विजय दिलाने में काम आया.
केरल में पी. विजयन की वापसी क्यों नहीं हुई? 5 बड़े कारण 1- विकास के मुद्दों पर हुए विवादकुछ बड़े प्रोजेक्ट्स को लेकर विवाद हुए. जनता को लगा कि विकास की गति धीमी है. कई योजनाओं का असर जमीन पर कम दिखा. इससे लोगों का भरोसा कमजोर हुआ. विजिनझम इंटरनेशनल सीपोर्ट, केरल इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट फंड बोर्ड से चलने वाले प्रोजेक्ट्स पर भी ठीक-ठीक विवाद हुआ. कहीं पुनर्वास तो कहीं पर्यावरण तो कहीं आर्थिक घपले-घोटाले कारण बने.
केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन.
2- बेरोजगारी और आर्थिक दबावउच्च शिक्षित केरल राज्य में बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा बना रहा. सरकारी नौकरियों की कमी और निजी क्षेत्रों में अच्छी नौकरियों की कमी की वजह से युवाओं में असंतोष बढ़ा. रही-सही कसर महंगाई और आर्थिक दबाव ने पूरी कर दी और राज्य सरकार के खिलाफ माहौल बन गया.
3- विपक्ष की मजबूत रणनीतिविपक्ष ने इस बार बेहतर तैयारी की. उन्होंने सरकार की कमियों को जोरदार तरीके से उठाया. जनता तक अपनी बात पहुंचाई. इससे मुकाबला कड़ा हो गया और सत्ता पक्ष कमजोर पड़ा. कानून-व्यवस्था पर सरकार लगातार घिरी रही. विपक्ष ने इसे भी पूरे पांच साल तक दबने नहीं दिया.
सीएम के रूप में पी विजयन बीते 10 वर्ष से सत्ता में हैं.
4- छवि को नुकसान पहुंचाने वाले विवादकुछ मामलों और आरोपों ने सरकार की छवि को प्रभावित किया. मीडिया में इन मुद्दों पर काफी चर्चा हुई. इससे जनता का भरोसा डगमगाया. गोल्ड स्मगलिंग केस, लाइफ मिशन हाउसिंग स्कीम विवाद, स्प्रिंकलर डेटा डील विवाद, के-रेल समेत कई अन्य प्रोजेक्ट्स ने मौजूद सरकार की वाट लगाने में मजबूत काम किया.
5- केरल में चली सत्ता विरोधी लहरसीएम के रूप में पी विजयन बीते 10 वर्ष से सत्ता में हैं. लंबे समय तक सत्ता में रहने से जनता में स्वाभाविक नाराजगी बढ़ जाती है. यही असर यहां भी दिखा. लोगों को बदलाव की इच्छा हुई. सरकार के खिलाफ माहौल बना.
तमिलनाडु में विजय की जीत और केरल में पी. विजयन की हार, दोनों ही हमें राजनीति के कई सबक सिखाते हैं. जनता हमेशा बदलाव चाहती है. जो नेता जनता से जुड़ा रहता है, उसे समर्थन मिलता है. वहीं, जो सरकार लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरती, उसे नुकसान होता है. छवि, काम और जनता से लगातार संवाद, ये तीन चीजें सबसे अहम हैं. विजय ने इन तीनों पर काम किया. वहीं, केरल में इन क्षेत्रों में कमी महसूस हुई, इसलिए परिणाम अलग-अलग रहे. यह भी कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता. हर चुनाव नई कहानी लिखता है. यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी है.
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