चुनाव खत्म… अब क्या महंगा होगा पेट्रोल-डीजल? सरकार पर रोज 1000 करोड़ रुपये का बोझ
et May 09, 2026 02:42 PM
चुनाव खत्म होने के बाद अब सरकार के सामने सबसे बड़ा और सबसे संवेदनशील आर्थिक फैसला खड़ा हो गया है। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं? पिछले करीब 70 दिनों से पश्चिम एशिया संकट और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के बावजूद भारत ने आम लोगों पर सीधा बोझ नहीं डाला, लेकिन अब हालात तेजी से बदलते दिख रहे हैं। सरकार पर रोजाना लगभग 1,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है और तेल कंपनियों का घाटा भी खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है।
भारत दुनिया के उन बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है जिसने पश्चिम एशिया संकट के बावजूद पेट्रोल-डीजल के दामों में बढ़ोतरी नहीं की। शुरुआत में उम्मीद थी कि युद्धविराम और कूटनीतिक बातचीत के बाद हालात सामान्य हो जाएंगे, होर्मुज जलडमरूमध्य खुलेगा और कच्चे तेल की कीमतें नीचे आएंगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ब्रेंट क्रूड अब भी 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है और इससे सरकार की चिंता लगातार बढ़ रही है।
सरकार आखिर कब तक उठाएगी इतना बड़ा बोझ?सरकारी अनुमान के मुताबिक ऊंचे कच्चे तेल और गैस की कीमतों की वजह से सरकार को हर दिन करीब 1,000 करोड़ रुपये का झटका लग रहा है। जब ब्रेंट क्रूड 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा था, तब सरकार ने पेट्रोल पर करीब 24 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 30 रुपये प्रति लीटर का बोझ खुद उठाया था ताकि आम जनता पर असर कम पड़े।
इसके अलावा तेल कंपनियों को राहत देने के लिए सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाई, जिससे करीब 1.70 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त असर पड़ा। बावजूद इसके अप्रैल के अंत तक तेल कंपनियों का घाटा करीब 30,000 करोड़ रुपये पहुंच गया था और चालू तिमाही के अंत तक इसके 50,000 करोड़ रुपये से ज्यादा होने का अनुमान है।
गैस सिलेंडर पर भी भारी सब्सिडीसिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, एलपीजी सिलेंडर पर भी सरकार भारी सब्सिडी दे रही है। फिलहाल सरकार हर 14 किलो वाले गैस सिलेंडर पर करीब 600 रुपये का बोझ उठा रही है। वहीं उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को अतिरिक्त 300 रुपये की राहत दी जा रही है।
हालात ऐसे हैं कि गैस की खपत नियंत्रित करने के लिए सरकार को कुछ सेक्टर्स में गैस नियंत्रण आदेश तक जारी करने पड़े, जिसका असर गैस आधारित उद्योगों पर पड़ा है। इसके बावजूद भारत को रोज करीब 20,000 टन गैस आयात करनी पड़ रही है।
होर्मुज संकट ने बढ़ाई मुश्किलेंमौजूदा संकट इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि इतिहास में पहली बार होर्मुज जलडमरूमध्य इतनी लंबी अवधि तक प्रभावी रूप से बाधित रहा है। 1970 के दशक के अरब ऑयल एम्बार्गो से लेकर ईरान-इराक युद्ध तक, तेल सप्लाई पूरी तरह नहीं रुकी थी। लेकिन इस बार हालात अलग हैं।
भारत को अब सिर्फ महंगा कच्चा तेल ही नहीं खरीदना पड़ रहा, बल्कि समुद्री बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई लागत भी तेजी से बढ़ गई है। जहाजों को केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेजने की वजह से डिलीवरी में 2 से 3 हफ्ते की अतिरिक्त देरी हो रही है और फ्रेट कॉस्ट लगभग 15% से 20% तक बढ़ गई है। कतर का बड़ा LNG टर्मिनल ‘रस लाफान’ भी मार्च से बंद है और उसे पूरी तरह ठीक होने में तीन साल तक लग सकते हैं। इससे वैश्विक गैस बाजार में और अनिश्चितता बढ़ गई है।
सरकार के सामने राजनीतिक और आर्थिक दुविधाअब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अगर पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाई जाती हैं तो उसका असर सिर्फ वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहेगा। ट्रांसपोर्ट महंगा होगा, खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी और महंगाई का दबाव कई सेक्टर्स में दिखेगा।
लेकिन दूसरी तरफ लगातार घाटा उठाना भी आसान नहीं है। दुनियाभर के कई देशों ने पहले ही ईंधन कीमतों में 20% से 30% तक बढ़ोतरी कर दी है। चीन, जर्मनी, ब्रिटेन और नॉर्वे जैसे देशों में पेट्रोल की कीमतें काफी बढ़ चुकी हैं। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने भी कीमतें बढ़ाने के साथ कई बचत उपाय लागू किए हैं। भारत अब तक इन कदमों से बचता रहा है, लेकिन विशेषज्ञ मान रहे हैं कि अब सरकार के पास विकल्प तेजी से कम होते जा रहे हैं।
क्या आने वाला है बड़ा फैसला?सरकार पिछले दो-तीन हफ्तों से इस बात पर मंथन कर रही है कि क्या अब उपभोक्ताओं तक कुछ बोझ पहुंचाने का समय आ गया है। हालांकि 20% से 30% जैसी बड़ी बढ़ोतरी जनता के लिए झटका साबित हो सकती है और राजनीतिक रूप से भी यह आसान फैसला नहीं होगा।
फिलहाल इतना साफ है कि पश्चिम एशिया संकट ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक रणनीति दोनों को चुनौती दी है। आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर सरकार क्या फैसला लेती है, इस पर पूरे देश की नजर टिकी रहेगी।
(अस्वीकरण: विशेषज्ञों द्वारा दी गई सिफारिशें, सुझाव, विचार और राय उनके अपने हैं। ये इकोनॉमिक टाइम्स हिन्दी के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।)