IQ नहीं, कैसा है आपका HQ, 25-34 साल वालों का सबसे कम; 41% भारतीयों की कमाई बढ़ाने में बिगड़ रही सेहत?
et June 06, 2026 12:42 PM
अगर आप मानते हैं कि ज्यादा कमाई, बेहतर नौकरी और फिटनेस ऐप्स तक पहुंच आपको स्वस्थ बनाती है, तो यह रिपोर्ट आपकी सोच बदल सकती है. India Health Quotient 2026 की रिपोर्ट बताती है कि देश का सबसे युवा और सबसे महत्वाकांक्षी वर्ग ही अपनी सेहत को लेकर सबसे ज्यादा संघर्ष कर रहा है. 25-34 साल के शहरी भारतीयों का Health Quotient सिर्फ 63 है, जो 35-49 आयु वर्ग और 50 साल से ज्यादा उम्र वालों से भी कम है. यह उस धारणा के उलट है कि युवा पीढ़ी सबसे ज्यादा हेल्दी महसूस करती होगी.
ये रिपोर्ट ManipalCigna हेल्थ इंश्योरेंस और YouGov India ने निकाली है. इसके मुताबिक भारत का कुल Health Quotient 65 है, जो 'गुड' कैटेगरी में आता है. लेकिन इस औसत आंकड़े के नीचे एक बड़ी चिंता छिपी हुई है. वित्तीय स्वास्थ्य का स्कोर सिर्फ 62 है, जो पांचों स्वास्थ्य आयामों में सबसे कम है. यही वह क्षेत्र है जो बाकी सभी पहलुओं पर दबाव डाल रहा है.
सबसे दिलचस्प और चिंताजनक बात यह है कि 41% शहरी भारतीयों ने माना कि वित्तीय लक्ष्यों का पीछा करना खुद उनके लिए तनाव और चिंता का कारण बन गया है. बेहतर भविष्य, ज्यादा बचत, निवेश और आर्थिक सुरक्षा की कोशिश में लोग मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर झेल रहे हैं. 36% लोगों का कहना है कि हेल्दी रहने के लिए अच्छा खाना, सप्लीमेंट्स और हेल्थ चेकअप जैसी चीजों पर खर्च करना उनके वित्तीय हालात पर दबाव डाल रहा है.
रिपोर्ट इस स्थिति को 'Health Debt Trap' कहती है. इसका मतलब है कि पैसे कमाने और वित्तीय लक्ष्य हासिल करने का तनाव सेहत को नुकसान पहुंचाता है. फिर खराब होती सेहत को ठीक करने के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है. इस पूरी प्रक्रिया में तनाव और बढ़ता है और व्यक्ति एक ऐसे चक्र में फंस जाता है जिससे निकलना आसान नहीं होता.
युवा वर्ग में यह दबाव सबसे ज्यादा दिखाई देता है. 25-34 आयु वर्ग के 20% लोगों ने कहा कि उनका तनाव अब संभालने लायक नहीं रह गया है, जबकि 50 साल से ज्यादा उम्र वालों में यह आंकड़ा सिर्फ 8% है. यही नहीं, 54% युवाओं ने मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य से ज्यादा महत्वपूर्ण बताया. 56% युवाओं का कहना है कि बाहरी दबाव और तनाव को संभालना उनके लिए सबसे बड़ी मानसिक स्वास्थ्य चुनौती है.
रिपोर्ट एक और दिलचस्प बदलाव की ओर इशारा करती है. पहली बार मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को बराबर महत्व मिला है. शहरी भारतीयों में 50% लोग मानसिक स्वास्थ्य को उतना ही महत्वपूर्ण मानते हैं जितना शारीरिक स्वास्थ्य को. हालांकि व्यवहार में अभी भी अंतर है. सिर्फ 40% लोगों ने जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता लेने को अपनी शीर्ष प्राथमिकताओं में शामिल किया.
तनाव की तस्वीर भी कम चिंताजनक नहीं है. 82% भारतीयों ने माना कि वे किसी न किसी स्तर पर तनाव महसूस करते हैं. इनमें से 14% ने अपने तनाव को असहनीय बताया. दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ 1% लोगों ने अपनी कुल सेहत को खराब बताया. यानी बाहर से सब कुछ सामान्य दिख रहा है, लेकिन भीतर तनाव का दबाव लगातार बढ़ रहा है.
रिपोर्ट का निष्कर्ष साफ है. आज की शहरी जिंदगी में स्वास्थ्य सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं रह गया है. मानसिक स्थिति, वित्तीय सुरक्षा, कामकाजी जीवन और सामाजिक रिश्ते सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. और फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती शरीर नहीं, बल्कि पैसे और तनाव के बीच फंसा हुआ जीवन है. शायद इसलिए सवाल अब सिर्फ IQ का नहीं, बल्कि HQ यानी Health Quotient का भी है.