kanwar Yatra 2026: क्या है कांवड़ यात्रा और कहां-कहां होती है, किसने की थी पहली बार?
TV9 Bharatvarsh June 10, 2026 06:44 PM

History of Kanwar Yatra: साल 2026 का सावन का महीना बस आने ही वाला है. द्रिक पंचांग के अनुसार, इस साल पावन कांवड़ यात्रा यानी सावन माह की शुरुआत 30 जुलाई 2026 से होने जा रही है. वहीं, सावन का समापन 28 अगस्त 2026 को सावन पूर्णिमा के साथ होगा. शिवभक्तों के लिए यह यात्रा 11 अगस्त 2026 को सावन शिवरात्रि के दिन महादेव के जलाभिषेक के साथ पूरी होगी. सावन के इस पावन मौके पर आइए बेहद आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर क्या है कांवड़ यात्रा, यह कहां-कहां आयोजित होती है और इतिहास में पहली बार किसने कांवड़ उठाई थी.

क्या होती है कांवड़ यात्रा?

कांवड़ यात्राभगवान शिव को समर्पित एक धार्मिक यात्रा है. इस यात्रा में शिवभक्त गंगा या अन्य पवित्र नदियों के तट पर पहुंचते हैं, वहां स्नान करते हैं और कलश में जल भरते हैं. इसके बाद उस जल को कांवड़ में बांधकर अपने कंधों पर उठाते हैं और पैदल चलकर अपने क्षेत्र के शिव मंदिर तक पहुंचते हैं. वहां शिवलिंग पर जल अर्पित कर भगवान भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. कांवड़ आमतौर पर बांस या लकड़ी से बनी होती है, जिसे रंग-बिरंगे झंडों,फूलों से सजाया जाता है. फिर इसके दोनों सिरों पर जल से भरे कलश लटकाए जाते हैं.

सावन में क्यों खास होती है कांवड़ यात्रा?

धार्मिक मान्यता है कि सावन माह भगवान शिव का प्रिय महीना है. इस दौरान की गई पूजा, व्रत और जलाभिषेक का कई गुना अधिक फल मिलता है. कहा जाता है कि भगवान शिव केवल एक लोटा जल अर्पित करने से भी प्रसन्न हो जाते हैं. यही कारण है कि लाखों श्रद्धालु कठिन यात्रा करके गंगाजल लाते हैं और शिवलिंग पर अर्पित करते हैं.

कहां-कहां होती है कांवड़ यात्रा?

देश के कई राज्यों में कांवड़ यात्रा निकाली जाती है, लेकिन उत्तर भारत में इसका विशेष महत्व है. उत्तराखंड के हरिद्वार, गंगोत्री और गोमुख से बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंगाजल लेकर निकलते हैं. इसके अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी कांवड़ यात्रा बड़े स्तर पर आयोजित होती है. वैसे विशेष रूप से हरिद्वार से जल भरकर मेरठ, गाजियाबाद, दिल्ली, नोएडा, आगरा, अलीगढ़, कानपुर और अन्य शहरों के शिवालयों तक पहुंचाने की परंपरा काफी प्रसिद्ध है.

कांवड़ यात्रा File Photo: PTI

क्या है अजगैबीनाथ और जाह्न्वी गंगा की कथा?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राजा सगर के 60 हजार पुत्रों के उद्धार के लिए जब भागीरथ गंगा को पृथ्वी पर लेकर आ रहे थे, तब अजगैबीनाथ क्षेत्र में ऋषि जाह्न्वी की तपस्या गंगा की तेज धारा से भंग हो गई.क्रोधित होकर ऋषि ने पूरी गंगा को पी लिया. बाद में भागीरथ के अनुरोध पर उन्होंने अपनी जंघा से गंगा को फिर से प्रवाहित किया. इसी कारण गंगा को यहां जाह्न्वी नाम से भी जाना जाता है. यह कथा आज भी श्रद्धालुओं के बीच बेहद लोकप्रिय है.

सबसे पहले किसने की थी कांवड़ यात्रा?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम को पहला कांवड़िया माना जाता है. कहा जाता है कि उन्होंने सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ को अर्पित किया था. मान्यता है कि यहीं से कांवड़ यात्रा की परंपरा की शुरुआत हुई. यही वजह है कि आज भी सावन के दौरान लाखों कांवड़िए इसी परंपरा का पालन करते हुए गंगाजल लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं.

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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