शुक्रवार से विमेंस टी20 वर्ल्ड कप शुरू होने वाला है. इस टूर्नामेंट का पहला मैच इंग्लैंड और श्रीलंका के बीच और होगा. अगर बात भारत की करें तो टीम को अपने पहले ही मुकाबले में पाकिस्तान का सामना पड़ेगा. ये मैच 14 जून को खेला जाना है. लेकिन आज बात सिर्फ विमेंस टी20 वर्ल्ड कप 2026 की नहीं होगी. बल्कि भारत में विमेंस क्रिकेट के बढ़ते साम्राज्य कसे लेकर होगी. भारतीय खेल जगत में इस समय एक नई आर्थिक क्रांति चल रही है, और इस क्रांति का चेहरा है-‘महिला क्रिकेट’. पिछले 3-4 वर्षों में भारत के भीतर महिला क्रिकेट का कमर्शियल मार्केट वैल्यू (Commercial Market Value) आसमान छूते हुए 5,000 करोड़ रुपए के कुल वैल्यूएशन को पार कर चुका है.
विमेंस प्रीमियर लीग (WPL) की शुरुआत, टेलीविजन और डिजिटल स्क्रीन पर करोड़ों की व्यूअरशिप, और बड़े कॉर्पोरेट घरानों द्वारा महिला क्रिकेटर्स पर की जा रही पैसों की बारिश ने यह साबित कर दिया है कि भारत में महिला क्रिकेट अब महज एक खेल नहीं, बल्कि सबसे तेजी से फलने-फूलने वाला एक ‘मेगा-बिजनेस’ बन चुका है. खास बात तो ये है कि ग्लोबल विमेंस क्रिकेट कमर्शियल वैल्यू की करें तो वो 1 बिलियन डॉलर के लेवल को पार कर चुका है. जिसमें भारत की हिस्सेदारी 50 फीसदी से ज्यादा देखने को मिल रही है. आइए आपको भी बताते हैं कि आखिर देश भारतीय महिला क्रिकेट की इकोनॉमी में कैसे ऐतिहासिक उछाल देखने को मिला है?
WPL: कमाई और वैल्यूएशन का पावरहाउसभारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) द्वारा संचालित WPL भारत में महिला स्पोर्ट्स इकॉनमी की रीढ़ की हड्डी बन चुका है. इसकी वित्तीय ताकत का अंदाजा आप तीन पैमानों से लगा सकते हैं. जिसमें फ्रेंचाइजी की रिकॉर्ड बिक्री, मीडिया राइट्स सेंट्रल स्पॉन्सरशिप शामिल है.
वह दौर बीत चुका है जब ब्रांड्स केवल पुरुष क्रिकेटर्स (जैसे विराट कोहली या रोहित शर्मा) के पीछे भागते थे. इंडियन एड मार्केट में आज महिला क्रिकेटर्स की मांग 250 फीसदी की सालाना दर से बढ़ रही है. स्मृति मंधाना मौजूदा समय में हुंडई, हर्बालाइफ, गल्फ ऑयल और बूस्ट जैसे 15 से अधिक ब्रांड्स का चेहरा हैं. उनकी एक ब्रांड एंडोर्समेंट फीस 1 करोड़ से 2 करोड़ रुपए प्रति वर्ष तक पहुंच चुकी है. हरमनप्रीत कौर और जेमिमा रोड्रिग्स की बात करें तो प्यूमा और सिएट जैसे स्पोर्ट्स और ऑटोमोबाइल दिग्गजों के साथ करोड़ों की मल्टी-ईयर डील साइन कर रही हैं. इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के अनुसार महिला क्रिकेटर्स के साथ जुड़ने पर ब्रांड्स को एक बहुत ही समर्पित, सकारात्मक और बढ़ती हुई पारिवारिक ऑडियंस (Family Audience) मिलती है, जिससे ब्रांड की साख और सेल्स सीधे तौर पर बढ़ती है.
स्टेडियमों की टिकट और डिजिटल रीचडिजिटल माध्यमों (जैसे जियोसिनेमा) पर महिला क्रिकेट मैचों को मिलने वाले फ्री-टू-एयर एक्सेस ने व्यूअरशिप के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. हालिया भारत-ऑस्ट्रेलिया बाइलेटरल सीरीज और WPL मैचों के दौरान डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर 50 से 70 मिलियन (5 से 7 करोड़) से अधिक यूनिक व्यूअर्स दर्ज किए गए. इसके अलावा, मुंबई के डीवाई पाटिल और बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में होने वाले मैचों में टिकटों की 100 फीसदी बिक्री (हाउसफुल) अब एक रुटीन बात बन चुकी है.
| रेवेन्यू का जरिया |
हिस्सेदारी और प्रभाव |
इकोनॉमिक कंट्रीब्यूशन (अनुमानित) |
| WPL फ्रेंचाइजी और स्पॉन्सरशिप |
कॉर्पोरेट निवेश, जर्सी और ऑन–ग्राउंड ब्रांडिंग |
₹4,000+ करोड़ |
| ब्रॉडकास्टिंग एवं डिजिटल राइट्स |
टीवी और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स द्वारा चुकाई गई फीस |
₹1,000+ करोड़ |
| खिलाड़ियों की एंडोर्समेंट वैल्यू |
व्यक्तिगत विज्ञापनों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंस से आय |
₹300-₹500 करोड़ |
इस बिजनेस बूम का सबसे बड़ा फायदा महिला क्रिकेटरों की जेब को हुआ है. BCCI के ‘समान वेतन नीति’ (Equal Match Fee Policy) के तहत अब महिला क्रिकेटर्स को भी पुरुषों की तरह ही प्रति टेस्ट 15 लाख रुपए, प्रति वनडे 6 लाख रुपए और प्रति टी20 मैच 3 लाख रुपए मिलते हैं. इसके अलावा, WPL की टॉप खिलाड़ियों की सालाना सैलरी 3.4 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है, जिसने देश की युवा लड़कियों के लिए क्रिकेट को एक बेहद आकर्षक और सुरक्षित करियर ऑप्शन बना दिया है.
चुनौतियां भी नहींइस जबरदस्त ग्रोथ के बावजूद, जानकारों का मानना है कि महिला क्रिकेट को अभी और अधिक ‘बाइलेटरल सीरीज’ (Bilateral Series) और टेस्ट मैचों की जरूरत है ताकि कमाई का साइकिल साल भर बना रहे. एसोसिएट देशों (छोटे क्रिकेटिंग देशों) में जमीनी स्तर पर बुनियादी ढांचे (Infrastructure) में निवेश बढ़ाना इस बिजनेस को सस्टेनेबल बनाने के लिए आवश्यक है.