Governor Review: बंद कमरों में रचा गया वो सीक्रेट मिशन जिसने बदल दी भारत की तकदीर, जानें कैसी है मनोज बाजपेयी की फिल्म
TV9 Bharatvarsh June 12, 2026 01:44 PM

Governor Review In Hindi: पैसा कमाना, गिनना और उसे खर्च करना… ये तीन ऐसी चीजें हैं जो दुनिया में हर किसी को पसंद हैं. लेकिन इस पैसे के पीछे का जो मैथ्स है, जो साइंस है और जो इकोनॉमिक्स (अर्थशास्त्र) है, वो कॉमर्स वालों को छोड़कर बाकी किसी के पल्ले नहीं पड़ती. अब जरा सोचिए, ऐसे सूखे, उबाऊ और भारी-भरकम विषय को उठाकर अगर कोई दो घंटे से ज्यादा की फिल्म बना दे, तो वो अपने आप में किसी बड़े चैलेंज से कम नहीं है. लेकिन निर्देशक चिन्मय डी. मांडलेकर और एक्टिंग के उस्ताद मनोज बाजपेयी ने इस चुनौती को न सिर्फ स्वीकार किया, बल्कि बकायदा पूरी ईमानदारी के साथ पर्दे पर निभाया भी है. फिल्म का नाम है ‘गवर्नर’.

ये फिल्म हमें भारत के आर्थिक इतिहास के एक ऐसे काले और डरावने पन्ने पर ले जाती है, जिसके बारे में हमारी आज की पीढ़ी को शायद ही कुछ पता हो. हम आम लोग अक्सर इस बात से बेखबर होते हैं कि देश चलाने के पीछे क्या-क्या खेल हो रहे होते हैं. फिल्म ‘गवर्नर‘ उसी छिपे हुए सच का एक दिलचस्प और आंखें खोल देने वाला माध्यम है.

जानें क्या है फिल्म गवर्नर की कहानी?

कहानी की शुरुआत आज के दौर से होती है, साल 2022 का श्रीलंका, जो पूरी तरह दिवालिया हो चुका है और वहां के नागरिक दाने-दाने को मोहताज होकर सड़कों पर हैं. इसी खौफनाक मंजर को देखते हुए 1990 के भारत का फ्लैशबैक शुरू होता है. पत्रकार अदिति वर्मा (अदा शर्मा) अपने पोते को वो कहानी सुना रही हैं, जो उन्होंने खुद अपनी आंखों से देखी थी.

ये कहानी है रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के गवर्नर ए. रामनन (मनोज बाजपेयी) की, जो असल जिंदगी के तत्कालीन गवर्नर एस. वेंकिटरमणन के किरदारों और घटनाओं से प्रेरित है. साल 1990 में भारत की आर्थिक स्थिति इतनी बदतर हो चुकी थी कि देश के पास अपनी सरकार चलाने और कर्ज चुकाने के लिए सिर्फ 1.2 बिलियन डॉलर बचे थे. विदेशी मुद्रा भंडार पूरी तरह खाली हो रहा था, महंगाई आसमान छू रही थी, खाड़ी युद्ध की वजह से तेल का संकट था और ऊपर से देश में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल था. सरकारें बदल रही थीं, नेताओं के एसासिनेशन (हत्याएं) हो रहे थे.

ऐसे में देश को कंगाली और बदनामी से बचाने के लिए गवर्नर ए. रामनन एक ऐसा फैसला लेते हैं, जो जितना साहसिक था, उतना ही विवादास्पद भी. अब इस फैसले के बाद क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े, नेताओं के साथ क्या नेगोशिएशन हुए, यही इस पॉलिटिकल-इकोनॉमिक थ्रिलर की मुख्य कहानी है.

जानें कैसी है फिल्म?

अक्सर लोगों को लगता है कि बैंक, आरबीआई और देश के बजट पर बनी फिल्म होगी तो सिर के ऊपर से जाएगी या फिर बोर कर देगी. लेकिन ‘गवर्नर’ की सबसे बड़ी खूबी यही है कि ये आपको एक पल के लिए भी बोर नहीं होने देती. डायरेक्टर ने इसे डॉक्युमेंट्री या ‘बॉलीवुडिया रोना-धोना’ बनाने के बजाय एक रेस-अगेंस्ट-टाइम थ्रिलर की तरह पेश किया है.

फिल्म में इतिहास के कितने फैक्ट्स सही हैं और कितने ड्रामे के लिए बदले गए हैं, इस बहस में पड़े बिना अगर हम इसे एक सिनेमा की तरह देखें, तो ये एक बेहद दिलचस्प फिल्म है. फिल्म का पहला हाफ माहौल बनाने और संकट की गंभीरता समझाने में थोड़ा वक्त लेता है, लेकिन जैसे ही सेकेंड हाफ शुरू होता है और ‘सीक्रेट मिशन’ चालू होता है, फिल्म अचानक एक ग्रिपिंग थ्रिलर में तब्दील हो जाती है.

डायरेक्शन और राइटिंग

चिन्मय डी. मांडलेकर ने बतौर निर्देशक कमाल का काम किया है. उन्होंने फिल्म में सस्पेंस और पॉलिटिकल ड्रामे को बहुत अच्छे से मेंटेन किया है. हालांकि, फिल्म की राइटिंग और स्क्रीनप्ले में कहीं-कहीं थोड़ी सुस्ती आती है, खासकर उन सीन्स में जो बहुत ज्यादा डायलॉग-हैवी (बातचीत से भरे) हैं. वहां फिल्म की रफ्तार थोड़ी कम हो जाती है. लेकिन फिल्म के कुछ सीन्स इतने तगड़े लिखे गए हैं कि वो आपके दिमाग पर छप जाते हैं. उदाहरण के लिए, एक सीन है जहां मनोज बाजपेयी देश की किस्मत का फैसला करने वाले एक बेहद जरूरी कागजात पर साइन करने के लिए किसी महंगे ‘पार्कर’ पेन का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि जेब से निकालकर 2 रुपये वाला साधारण पेन इस्तेमाल करते है.

ये एक सीन बिना किसी लंबे डायलॉग के उस किरदार की सादगी, ईमानदारी और उसकी जड़ों को बयां कर देता है. राइटिंग की बात करें तो किरदारों पर थोड़ा और काम हो सकता था, लेकिन फिर भी चिन्मय मंडलेकर ने इस फिल्म के साथ देश के इतिहास के एक दबे हुए पक्ष को पूरी ईमानदारी के साथ हमारे सामने पेश करने की कोशिश की थी.

जानें कैसी है ‘गवर्नर’ फिल्म के कलाकारों की एक्टिंग?

अब आते हैं उस डिपार्टमेंट पर, जिसके दम पर ये फिल्म टिकी है यानी एक्टर्स की एक्टिंग. मनोज बाजपेयी इस देश के उन गिने-चुने एक्टर्स में से हैं जो अगर स्क्रीन पर सिर्फ चुपचाप बैठ भी जाएं, तो अपनी आंखों से पूरी कहानी कह देते हैं. ‘गवर्नर’ के रूप में उन्होंने एक बार फिर मास्टरक्लास परफॉर्मेंस दी है. उन्होंने इस रोल को लाउड या फिल्मी नहीं बनने दिया. देश की कंगाली का जो बोझ, एक लीडरशिप का जो तनाव और जो नैतिक उलझनें उनके चेहरे पर दिखती हैं, वो आपको अंदर तक हिला देती हैं.

अदा शर्मा ने एक जिद्दी पत्रकार अदिति वर्मा के किरदार में अच्छा काम किया है. उनका किरदार दिखाता है कि कैसे 90 के दशक में पत्रकार एक एक्सक्लूसिव खबर के लिए किस हद तक भागदौड़ करते थे. वहीं, लंबे समय बाद पर्दे पर दिखीं मधु का सपोर्टिंग रोल छोटा लेकिन बेहद प्रभावी है. बाकी की पूरी सपोर्टिंग कास्ट ने भी अपने किरदारों को बखूबी निभाया है.

देखें या नहीं

कुल मिलाकर, ‘गवर्नर’ एक बेहद जरूरी, ईमानदार और आंखें खोल देने वाली फिल्म है. ये उन लोगों की कहानी है जो बिना किसी शोर-शराबे के, बिना लाइमलाइट में आए, पर्दे के पीछे रहकर देश की तकदीर बदल देते हैं. ये फिल्म हमें याद दिलाती है कि देश सिर्फ सरहदों पर बंदूक तानकर ही नहीं बचाया जाता, कभी-कभी देश की लाज बचाने के लिए दफ्तरों में बैठकर दिमाग और कलम की ताकत का इस्तेमाल भी करना पड़ता है.

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