बिना अनुमति लंबे समय अनुपस्थित कर्मचारी को नहीं मिलेगी बहाली और वेतन राहत: सुप्रीम कोर्ट
Indias News Hindi June 23, 2026 02:43 AM

New Delhi, 22 जून . Supreme Court ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले और लेबर कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक कर्मचारी को बकाया वेतन के साथ काम पर वापस रखने के लिए कहा गया था. कोर्ट ने कहा कि जो कर्मचारी बिना इजाजत के काम से गैर-हाजिर रहा और अपने दावों को साबित नहीं कर पाया, उसे ऐसी राहत नहीं दी जा सकती.

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मेसर्स रिफिलिस इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड की अपील को मंजूरी दी और कर्मचारी अर्जुन गुप्ता के दावे को खारिज कर दिया. गुप्ता का आरोप था कि जून 2012 में ड्यूटी पर लौटने की कोशिश करने के बाद उन्हें गैर-कानूनी तरीके से नौकरी से निकाल दिया गया था.

यह विवाद तब शुरू हुआ जब अगस्त 2006 से मोल्डर के तौर पर काम कर रहे कर्मचारी ने 14 मई 2012 से काम पर आना बंद कर दिया. कंपनी का दावा था कि वह बिना किसी सूचना के अनुपस्थित रहे और 18 मई 2012 को उनके आखिरी ज्ञात स्थायी पते पर स्पष्टीकरण मांगने के लिए एक नोटिस भेजा गया था.

शुरुआत में लेबर कोर्ट ने फरवरी 2022 में कर्मचारी के पक्ष में एकतरफा फैसला सुनाया था. इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए वापस भेजे जाने के बाद लेबर कोर्ट ने अक्टूबर 2023 में फिर से कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाया और उन्हें 50 प्रतिशत बकाया वेतन और उससे जुड़े लाभों के साथ नौकरी पर बहाल करने का आदेश दिया. बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस फैसले को बरकरार रखा.

Supreme Court ने पाया कि लेबर कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ने बिना किसी ठोस सबूत के राहत देने में गलती की थी.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस तर्क को खारिज करते हुए कि कंपनी ने गुप्ता को गौतमबुद्ध नगर स्थित उनके निवास के बजाय बिहार में उनके स्थायी पते पर नोटिस भेजा था. Supreme Court ने कहा कि नियोक्ता को अपने रिकॉर्ड में कर्मचारी द्वारा दिए गए पते पर भरोसा करने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा, “नियोक्ता से केवल उसी पते पर कर्मचारी से संपर्क करने की उम्मीद की जा सकती है जो कर्मचारी ने दिया है. अगर प्रतिवादी-कर्मचारी ने अपना निवास स्थान बदल लिया था तो बदलाव की जानकारी नियोक्ता को देने की जिम्मेदारी उसी की थी. उसे इस मामले में लापरवाही का फायदा उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती.”

Supreme Court को कर्मचारी के इस दावे का समर्थन करने वाला कोई सबूत नहीं मिला कि वह अपनी मां की गंभीर बीमारी के कारण अनुपस्थित रहा था या उसने जाने से पहले अपने वरिष्ठ अधिकारी को सूचित किया था.

Supreme Court ने कहा, “यह दावा पूरी तरह से निराधार है. इसके समर्थन में रिकॉर्ड पर कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया गया है.” कोर्ट ने आगे कहा कि अनुपस्थिति की अवधि के दौरान कर्मचारी ने अपनी अनुपस्थिति का कारण बताते हुए या छुट्टी मांगते हुए कोई लिखित सूचना नहीं भेजी थी. Supreme Court ने प्रतिवादी के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि वह 8 जून, 2012 को वापस आया था और उसने ड्यूटी पर लौटने की कोशिश की थी, लेकिन उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं दी गई. कोर्ट ने कहा कि इस आरोप के समर्थन में कोई दस्तावेजी सबूत नहीं था.

फैसले में कहा गया, “हमने पाया कि प्रतिवादी-कर्मचारी बिना इजाजत के अनुपस्थित रहा, अनुपस्थिति के दौरान अपने नियोक्ता को कोई लिखित सूचना नहीं दी, अपनी अनुपस्थिति का कारण बताने के लिए कोई दस्तावेजी सबूत पेश नहीं किया, और ड्यूटी पर लौटने की कोशिश का भी कोई सबूत नहीं दिया.”

यह मानते हुए कि लेबर कोर्ट और हाई कोर्ट ने बिना किसी ठोस सबूत के राहत देकर गलती की थी, Supreme Court ने कंपनी की अपील स्वीकार कर ली और लेबर कोर्ट के अक्टूबर 2023 के फैसले और इलाहाबाद हाई कोर्ट के मार्च 2024 के फैसले को रद्द कर दिया. नतीजतन, नौकरी पर बहाल करने, बकाया वेतन और सेवा से जुड़े अन्य सभी लाभों के निर्देश रद्द कर दिए गए और कर्मचारी का दावा खारिज कर दिया गया.

एससीएच/डीकेपी

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