जब भी कोई नई कार खरीदने की बात आती है तो लोग सबसे पहले उसके डिजाइन, फीचर्स और कलर पर ध्यान देते हैं. कई लोगों को ब्लैक कलर बेहद प्रीमियम लगता है. क्या आप जानते हैं कि काले रंग की कारों के दुर्घटना में शामिल होने की आशंका दूसरे रंगों की तुलना में ज्यादा है. इसके पीछे वजह कार की मजबूती या ड्राइवर की गलती नहीं, बल्कि गाड़ी का रंग और उससे जुड़ी विजिबिलिटी है.
सड़क सेफ्टी में कार का रंग भी बड़ी भूमिका निभाता है. ऑस्ट्रेलिया की एक रिसर्च में लाखों सड़क दुर्घटनाओं का विश्लेषण किया गया. रिसर्च में पाया गया कि सफेद रंग की कारों की तुलना में काले रंग की कारें कम दिखाई देती हैं, जिसके कारण एक्सीडेंट का जोखिम बढ़ जाता है. खासकर सुबह-सुबह, रात में या खराब मौसम के दौरान काली कारों को दूर से पहचानना मुश्किल हो जाता है.
इसके पीछे मुख्य कारण लाइट है. काला रंग प्रकाश को रिफ्लेक्ट करने की बजाय एब्जॉर्ब कर लेता है. यही वजह है कि अंधेरे या कम रोशनी वाले माहौल में काली कार आसपास के वातावरण में घुल जाती है. दूसरी ओर सफेद, पीले या हल्के रंग की कारें ज्यादा लाइट लौटाती हैं, जिससे वे दूर से भी आसानी से दिखाई देती हैं.
रात के समय यह समस्या और बढ़ जाती है. अगर सड़क पर पर्याप्त रोशनी नहीं है तो काली कार को पहचानने में दूसरे ड्राइवरों को ज्यादा समय लग सकता है. दुर्घटना से बचने में कई बार एक या दो सेकंड का समय भी बहुत जरूरी होता है. जब गाड़ी देर से दिखाई देता है तो सामने वाले ड्राइवर के पास ब्रेक लगाने या दिशा बदलने के लिए कम समय बचता है, जिससे दुर्घटना की आशंका बढ़ जाती है.
केवल काला ही नहीं, बल्कि ग्रे और सिल्वर रंग की कारें भी ज्यादा जोखिम वाली मानी जाती हैं. इसका कारण यह है कि ये रंग अक्सर सड़क, धुंध और बादलों के रंगों से मिल जाते हैं. वहीं सफेद, पीला, नारंगी और गोल्ड जैसे कलर ज्यादा सेफ माने जाते हैं क्योंकि ये लगभग हर मौसम और रोशनी की स्थिति में साफ दिखाई देते हैं. यही कारण है कि स्कूल बसों, निर्माण कार्यों में यूज होने वाली गाड़ियों और कई इमरजेंसी सेवाओं में चमकीले रंगों का इस्तेमाल किया जाता है.
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