भारत का इकलौता गांव, यहां 90% आबादी करती है सिर्फ इशारों में बातें… जानें इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण
TV9 Bharatvarsh June 29, 2026 02:43 PM

Silent Village Of India: भारत के सबसे खूबसूरत केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले की बर्फीली और सुरम्य पहाड़ियों के बीच एक ऐसा गांव बसा है, जिसकी हकीकत किसी को भी हैरान कर सकती है. इस गांव का नाम है धदकई (Dhadkai). वैसे तो इस गांव की प्राकृतिक खूबसूरती और वादियां पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं, लेकिन पूरी दुनिया में इस जगह की पहचान एक बेहद अलग और अनोखे नाम से है द साइलेंट विलेज ऑफ इंडिया, यानी भारत का शांत गांव.

इस गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां सन्नाटा पसरा नहीं रहता, बल्कि यहां का सन्नाटा आपस में बातें करता है. इस छोटे से पहाड़ी गांव में रहने वाले लोगों की एक बहुत बड़ी आबादी न तो सुन सकती है और न ही बोल सकती है. आइए जानते हैं इस अनोखे गांव की पूरी कहानी, इसका इतिहास और इसके पीछे का चौंकाने वाला मेडिकल साइंस का कारण.

क्या है धदकई गांव की जमीनी हकीकत?

धदकई गांव जम्मू से लगभग 260 किलोमीटर दूर दुर्गम पहाड़ी इलाके में स्थित है. इस गांव में मुख्य रूप से गुज्जर मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं, जो कि एक अनुसूचित जनजाति (ST) के अंतर्गत आते हैं.

गांव की कुल आबादी लगभग 2,000 के आसपास है, लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इस छोटे से गांव में 90 से ज्यादा लोग पूरी तरह से मूक-बधिर हैं. यहां रहने वाले 105 परिवारों में से 55 से ज्यादा परिवार ऐसे हैं, जिनके घर में कम से कम एक या उससे ज्यादा सदस्य न तो सुन सकते हैं और न ही बोल सकते हैं. कुछ परिवार तो ऐसे भी हैं, जहाँ 7 बच्चों में से 6 बच्चे जन्म से ही मूक-बधिर पैदा हुए हैं.

इस गांव की अपनी एक अनोखी ‘लोकल साइन लैंग्वेज’ है

चुनौतियों के बीच भी यहां के लोगों ने जीने का एक अनोखा रास्ता निकाल लिया है. इस गांव के लोगों ने अपनी खुद की एक ‘लोकल साइन लैंग्वेज’ (स्थानीय इशारों की भाषा) विकसित कर ली है. खास बात ये है कि गांव के जो लोग सुन और बोल सकते हैं, वे भी इस इशारों की भाषा को इतनी अच्छी तरह से जानते और समझते हैं कि पूरा गांव बिना किसी रुकावट के आपस में संवाद कर लेता है.

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कब और कैसे शुरू हुआ खामोशी का यह सिलसिला?

गांव के बुजुर्गों और ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स के मुताबिक, इस गांव में मूक-बधिर बच्चे के जन्म का पहला आधिकारिक मामला साल 1901 में सामने आया था, जब फौजी गुज्जर नाम के एक स्थानीय शख्स के घर एक ऐसा बेटा पैदा हुआ जो सुन-बोल नहीं सकता था. इसके बाद दशक दर दशक यह तादाद लगातार बढ़ती चली गई. साल 1990 में गांव में मूक-बधिर लोगों की संख्या 43 थी. साल 2007 में यह आंकड़ा बढ़कर 79 हो गया. अब गांव में 90 से ज्यादा लोग इस स्थिति में जीवन जी रहे हैं, जिनमें महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले काफी अधिक है.

आखिर क्यों इस गांव में गूंजती है ‘खामोशी’? वैज्ञानिकों ने ढूंढा कारण

सालों तक गांव के लोग इसे भगवान का कोई अभिशाप, बुरी किस्मत का खेल या फिर वहां के पानी और मिट्टी का रहस्यमयी असर मानते रहे. लेकिन जब वैज्ञानिकों और डॉक्टरों की विशेष टीमों ने इस गांव का दौरा किया और रिसर्च की, तो एक बेहद चौंकाने वाली मेडिकल वजह सामने आई. इसे मेडिकल साइंस में ‘जेनेटिक क्लस्टर’ (Genetic Cluster) या ‘फाउंडर्स इफेक्ट’ (Founder’s Effect) कहा जाता है.

इनब्रीडिंग और एंडोगेमी

गुज्जर समुदाय के लोग सदियों से अपनी ही जनजाति और करीबी रिश्तेदारों के भीतर (जैसे चचेरे-ममेरे भाई-बहनों में) शादियां करते आ रहे हैं. जब एक ही छोटे से जेनेटिक पूल (DNA संरचना) के लोग आपस में शादियां करते हैं, तो उनके जीन में छिपे हुए अनुवांशिक दोष अगली पीढ़ी में और ज्यादा उभरकर सामने आ जाते हैं.

OTOF जीन में खराबी

वैज्ञानिकों ने जब ग्रामीणों के खून के सैंपल लिए तो पाया कि इनके शरीर में OTOF (Otoferlin) नाम के जीन में गंभीर गड़बड़ी है. यह जीन हमारे कान के अंदरूनी हिस्से से दिमाग तक आवाज के सिग्नल भेजने का मुख्य काम करता है. जब माता और पिता दोनों के जरिए बच्चे में यह डिफेक्टिव जीन ट्रांसफर होता है, तो बच्चा जन्म से ही बहरा और गूंगा पैदा होता है.

क्या है इस बीमारी का समाधान और भविष्य की उम्मीद?

डॉक्टरों और जेनेटिक वैज्ञानिकों का कहना है कि इस अनुवांशिक बीमारी को रोकने का एकमात्र व्यावहारिक तरीका यही है कि गांव के युवा अपनी कम्युनिटी या करीबी रिश्तेदारों से बाहर (Out-marriage) शादियां करना शुरू करें. इसके अलावा, वैज्ञानिकों ने ‘कलर-कोडेड कार्ड्स’ बनाने का भी सुझाव दिया है ताकि शादी से पहले कपल्स के जेनेटिक रिस्क (जो कि 25% से 100% तक हो सकता है) को मापा जा सके और आने वाली पीढ़ी को इस खामोशी के चक्रव्यूह से बचाया जा सके.

राहत की बात यह है कि हाल के सालों में भारतीय सेना और कुछ प्रमुख सामाजिक संस्थाओं की मदद से यहाँ के युवाओं को ‘इंडियन साइन लैंग्वेज’ (ISL) सिखाने और उन्हें आधुनिक शिक्षा व रोजगार की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास शुरू किए गए हैं. ये कोशिशें इस शांत और खूबसूरत वादी में उम्मीद की एक नई किरण जगा रही हैं.

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