Hul Diwas: 1857 से पहले की क्रांति…. संथाल आदिवासियों ने कैसे हिलाई थी अंग्रेजों की नींव?
TV9 Bharatvarsh June 30, 2026 12:43 PM

जब पूरे भारत में अंग्रेजों का डंका बजता था. उनके आगे बड़े-बड़े नेता बोलने से बचते थे. अंग्रेजों की सरपरस्ती में रहने वाले ठेकेदारों, कोटेदारों तक ने आतंक मचाकर रखा था. वे संथाल समुदाय के लोगों की जमीनों पर कब्जा कर लेते. उन्हें कर्ज देते, फिर ब्याज के नाम पर तंग करते. जंगलों में रहकर अपनी आजीविका चलाने वाले आदिवासी समुदाय के लोग जब इनके आतंक से ऊब गए तो शुरू हुआ एक बड़ा आंदोलन, जो बाद में हूल दिवस के रूप में जाना-पहचाना गया.

आइए, हूल दिवस के बहाने पूरी की पूरी कहानी को समझते हैं. यह हर साल 30 जून को मनाया जाता है. हूल दिवस संथाल समुदाय के शौर्य की याद दिलाता है. उन्हीं की याद में मनाया जाता है. संथाल विद्रोह साल 1855-56 में हुआ था. यह विद्रोह बेअदबी और अन्याय के खिलाफ आदिवासी समुदाय ने किया, जिसकी चपेट में अंग्रेज और उनके कारिंदे भी आए.

आखिर संथाल कौन थे?

संथाल एक आदिवासी समुदाय है. वे पूर्वी भारत के जंगलों में रहते थे. तब का पूर्वी भारत मुख्य रूप से आज के झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार और ओडिशा में समाहित है. उनकी आजीविका खेती और वन उपज पर निर्भर थी. उनका जंगल के बाहर के समाज से कोई खास लेना-देना नहीं था. वे अपने रीति-रिवाज मानते थे. उन्हें कोई फोर्स नहीं कर सकता था.

साल 1855 में संथालों ने संगठित होकर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया. फोटो: The Illustrated London News

संथाल समुदाय के विद्रोह की वजह क्या थी?

ब्रिटिश शासन और स्थानीय दलालों ने उनकी जमीन पर कब्जा करना शुरू कर दिया. जमींदारों और ठेकेदारों ने भारी कर थोपे. साहूकारों ने कर्जे दिए और जब भुगतान नहीं हुआ तो जमीन जब्त कर ली. नए सफेद-पोश नौकरों और रेल-रोड मजदूरों ने भी उनके साथ खेल किया. जंगलों के नियम बदले गए. इसके बाद धीरे-धीरे समुदाय के लोगों की रोजमर्रा की जीवन शैली बिगड़ गई. यही कुछ ठोस वजह से विद्रोह शुरू हुआ.

उन्हें नए कानून समझ नहीं आते थे

अंग्रेजों ने जब देश पर शिकंजा कसना शुरू किया तो इसके शिकार संथाल समुदाय के लोग भी हुए. चूंकि वे जंगल में रहते. वहीं की उपज खाते-पीते तो उन्हें अंग्रेजी कानून समझ में नहीं आता था. धीरे-धीरे उन पर दबाव बनाने के अंग्रेजों ने कई तरीके अपनाए. ठेकेदारों ने उनके साथ ठगी की. स्थानीय नक्सल नहीं, बल्कि ठेकेदार और जमींदार थे, जो आंग्रेजी शासन के समर्थन से संथाल समुदाय की जमीन पर अधिकार जता रहे थे. कई बार महिलाओं और बच्चों पर भी अत्याचार हुए. सांस्कृतिक और आर्थिक आजादी टूटने लगी. ये सब मिलकर विद्रोह की चिंगारी भड़काने को पर्याप्त रहे.

ब्रिटिश शासन और स्थानीय दलालों ने संथाल समुदाय की जमीन पर कब्जा कर लिया था.

कुछ यूं हुई विद्रोह की शुरुआत

जब आतंक बढ़ गया तो साल 1855 में संथालों ने संगठित होकर विद्रोह किया. यह विद्रोह अचानक नहीं आया था. गुस्सा पहले से ही पनप रहा था. जमीन और कर्ज की समस्याएं गहरी हुई थीं. सिधू और कान्हू मुरमु नामक नेताओं के नेतृत्व में लोग एकत्र होने शुरू हुए. धीरे-धीरे स्थानीय नेता भी जुड़ने लगे. जब गुस्सा बढ़ता गया तो लोगों ने हथियार उठाए और ठेकेदारों, सरकारी संस्थाओं के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया. कुछ हमले भी होने लगे. सिधू और कान्हू दोनों भाई जैसे थे. वे सरल और प्रभावशाली थे. उन्होंने ग्रामीणों को बुलाकर एकजुट किया. उनका मकसद था उत्पीड़न खत्म करना. वे बड़े साहसी थे और सीधे अंग्रेजों व ठेकेदारों को चुनौती देते थे. लोग उन्हें मानते और उनके पीछे चलने लगे.

फिर विद्रोह बढ़ता गया

देखते ही देखते विद्रोह ने जल्द ही व्यापक रूप ले लिया. संथालों ने अंग्रेजों के कई ठिकानों पर हमला किया. कुछ कस्बों और पुलिस चौकियों को निशाना बनाया. ब्रिटिश प्रशासन ने शुरुआत में इसे स्थानीय दंगा माना. परन्तु स्थिति बढ़ते ही अंग्रेजी अफसरों ने सैन्य बल भेजा. कई लड़ाइयां हुईं. खून-खराबा भी हुआ. फिर संथालों को पहली सफलता मिली. पर, आधुनिक हथियारों और संगठित फौज के सामने उनका टिक पाना मुश्किल हुआ.

कई नेताओं को दी फांसी, सैकड़ों हुए गिरफ्तार

ब्रिटिशों ने बड़ी संख्या में सिपाहियों को भेजा. वे अत्यधिक हिंसा पर उतर आए. गांवों को नष्ट किया गया. कई संथाल मारे गए. सैकड़ों को गिरफ्तार किया गया. इस तरह विद्रोह दबा दिया गया. सिधू और कान्हू मुर्मू को ब्रिटिश प्रशासन ने पकड़ा और बाद में फांसी दे दी. उनके भाई चांद और भैरव और बहनों फूलोझानो की भी जानें इस संघर्ष में गईं. कुछ नेताओं को पकड़कर फांसी दी गई या जेल भेजा गया. इस हिंसा के बाद संथाल समुदाय को भारी क्षति हुई और विद्रोह कमजोर पड़ता गया.

संथाल इलाकों में स्थापित हुईं नई प्रशासनिक यूनिट्स

विद्रोह को दबाने के बाद ब्रिटिश प्रशासन ने एक और कदम उठाया. संथाल इलाकों को अलग प्रशासनिक इकाई बनाया गया. इसका मकसद उन इलाकों को अलग कर शांति स्थापित करना था. नई प्रशासनिक सीमाओं और नियमों से कुछ सुरक्षा मिली. पर समस्या की जड़ें पूरी तरह खत्म नहीं हुईं. अंग्रेजों ने कई नीतियां बाद में और बदलीं.

30 जून को क्यों मनाया जाता है हूल दिवस?

हूल संथाली भाषा का शब्द है. असल में 30 जून 1855 को भोगनाडीह गांव में एक बड़ी संथाल सभा हुई थी. उसी दिन सिधू और कान्हू मुर्मू ने विद्रोह की शुरुआत का ऐलान किया. इसलिए प्रति वर्ष 30 जून को हूल दिवस के रूप में याद किया जाता है. सैकड़ों-हजारों संथाल लोग भोगनाडीह में इकट्ठा हुए. वहां उन्होंने अंग्रेज़ों, महाजनों और जमींदारों के विरुद्ध संगठित विद्रोह का निर्णय लिया.

वे अपने अधिकार और जमीन की रक्षा की मांग लेकर उठ खड़े हुए. यही घटना हूल के रूप में इतिहास में दर्ज है. यह दिन संथालों की स्मृति और बलिदान के लिए समर्पित है. अलग-अलग जगहों पर कार्यक्रम होते हैं. लोक जागरण, काव्य पाठ, नृत्य और भाषण होते हैं. लोग अपने पूर्वजों की वीरता का सम्मान करते हैं. यह दिन आदिवासी अधिकारों की याद भी दिलाता है.

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