भारत में मंदिरों की संख्या बहुत बड़ी है. अनुमान के मुताबिक देश में करीब 10 लाख मंदिर हैं. इनमें ज्यादातर छोटे गांवों और कस्बों के मंदिर हैं, जिनका संचालन स्थानीय परिवार, पुजारी या समुदाय के लोग करते हैं. वहीं बड़े मंदिरों जैसे श्री राम जन्मभूमि मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर, हरिद्वार के प्रमुख मंदिरों और दक्षिण भारत के बड़े मंदिरों के पास जमीन, भवन, आभूषण और नकद दान के रूप में बड़ी संपत्ति होती है. इन मंदिरों में हर साल करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है. कई जगह दान नकद, सोना, चांदी या दूसरी कीमती वस्तुओं के रूप में मिलता है, जिसका पूरा हिसाब रखना चुनौती भरा होता है.
भारत में मंदिर प्रबंधन मुख्य रूप से तीन तरह से चलता है. पहला है पारिवारिक या पुजारी प्रबंधन. इसमें मंदिर किसी खास परिवार या वंशानुगत पुजारियों के नियंत्रण में होता है. पूजा-पाठ से लेकर चढ़ावा और मंदिर की देखरेख तक की जिम्मेदारी वही निभाते हैं. कई मंदिरों में यह व्यवस्था पीढ़ियों से चल रही है. कुछ जगह रोटेशन सिस्टम भी होता है, जहां अलग-अलग समूह तय समय के लिए प्रबंधन संभालते हैं. उदाहरण के तौर पर उडुपी श्री कृष्ण मठ में अलग-अलग मठ बारी-बारी से प्रबंधन करते हैं.
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क्या है महंत सिस्टम?
देश में दूसरी व्यवस्था महंत सिस्टम है. इसमें किसी मठ या मंदिर का पूरा नियंत्रण एक महंत या मठाधीश के पास होता है. वही मंदिर की संपत्ति, दान और प्रशासनिक फैसलों को संभालता है. उत्तराधिकारी तय करने का अधिकार भी अक्सर महंत के पास होता है. गोरखनाथ मठ जैसे संस्थान इसी मॉडल पर चलते हैं. तीसरी व्यवस्था अखाड़ा या पंचायती प्रणाली है. इसमें साधु-संतों के संगठन मंदिरों का संचालन करते हैं. पुजारियों की नियुक्ति, धार्मिक कार्यक्रम और दान प्रबंधन की जिम्मेदारी भी इन्हीं संगठनों के पास होती है. कुंभ जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों में इनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है.
मंदिर प्रबंधन में सरकारी दखल कोई नई बात नहीं
अब बात राज्य सरकार की भूमिका की करें तो मंदिर प्रबंधन में सरकारी दखल कोई नई बात नहीं है. इसकी शुरुआत अंग्रेजों के समय से हुई थी. 1863 का धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम और बाद में 1925 का मद्रास एक्ट इसी दिशा में बड़े कदम थे. आजादी के बाद कई राज्यों ने अपने कानून बनाए, जिनके तहत सरकार मंदिरों की आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था की निगरानी कर सकती है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25(2) के तहत राज्य को धार्मिक संस्थानों से जुड़ी आर्थिक, प्रशासनिक और प्रबंधकीय गतिविधियों को नियंत्रित करने का अधिकार दिया गया है. इसका मतलब यह है कि सरकार धार्मिक रीति-रिवाजों में सीधे हस्तक्षेप नहीं करती, लेकिन वित्तीय और प्रशासनिक मामलों की निगरानी कर सकती है.
देश के बड़े मंदिर सीधे सरकारी नियंत्रण में
देश के कई राज्यों में बड़े मंदिर सीधे सरकारी नियंत्रण या सरकारी बोर्ड के तहत चलते हैं. तमिलनाडु में 40 हजार से ज्यादा मंदिर हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के अधीन हैं. आंध्र प्रदेश में तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर का प्रबंधन तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम करता है, जहां सरकार ट्रस्टी और मुख्य अधिकारियों की नियुक्ति करती है. केरल में त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड कई बड़े मंदिरों का संचालन करता है, जिसमें सबरीमाला मंदिर भी शामिल है. उत्तर प्रदेश में काशी विश्वनाथ मंदिर जैसे बड़े मंदिर बोर्ड और प्रशासनिक अधिकारियों के जरिए संचालित होते हैं. राम मंदिर दान विवाद के बाद मंदिरों में पारदर्शिता, दान के सही हिसाब और ऑडिट व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है. सवाल यह उठ रहा है कि बड़े धार्मिक संस्थानों में दान और संपत्ति का प्रबंधन कितना पारदर्शी है और क्या मौजूदा सिस्टम पर्याप्त है. यही कारण है कि अब देशभर में मंदिर प्रबंधन की व्यवस्था पर चर्चा बढ़ गई है.
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