ओशन ऑफ पीस अलायंस, फिजी बना ऑस्ट्रेलिया का चौथा रक्षा सहयोगी; भारत के लिए इसके क्या हैं मायने?
TV9 Bharatvarsh July 06, 2026 04:43 PM

ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत क्षेत्र के अहम देश फिजी ने एक ऐतिहासिक रक्षा समझौते पर दस्तखत किए हैं, जिसे ओशन ऑफ पीस अलायंस नाम दिया गया है. अब फिजी, अमेरिका, न्यूजीलैंड और पापुआ न्यू गिनी के साथ ऑस्ट्रेलिया का चौथा ऐसा देश बन गया है, जिसके साथ उसका औपचारिक रक्षा समझौता है. इस समझौते के तहत दोनों देश जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की सुरक्षा और रक्षा में सहयोग करेंगे. ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने फिजी की राजधानी सुवा में प्रधानमंत्री सितिवेनी राबुका के साथ इस समझौते पर दस्तखत किए. आइए जानते हैं फिजी ने चीन से दूरी बनाकर ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ रिश्ते क्यों मजबूत किए. इस समझौते का भारत, QUAD और इंडो-पैसिफिक रणनीति पर क्या असर पड़ेगा

क्या है ‘ओशन ऑफ पीस’ एलायंस?

यह कदम सीधे तौर पर प्रशांत महासागर में चीन की बढ़ती सैन्य और कूटनीतिक दखलअंदाजी को रोकने की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम माना जा रहा है. समझौते के ये अहम पॉइंट्स हैं…

  • म्यूचुअल डिफेंस: दोनों देश एक-दूसरे की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होंगे.
  • संप्रभुता की रक्षा: इस समझौते का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच अपनी संप्रभुता की रक्षा करने, उनके पारस्परिक रक्षा और सुरक्षा हितों को सुरक्षित करने और प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता में योगदान देने की प्रतिबद्धता को मान्यता देना है.
  • खतरों पर साझा चर्चा: दोनों देश किसी भी ऐसे सुरक्षा-संबंधी घटनाक्रम पर एक-दूसरे से सलाह-मशविरा करेंगे, जिससे उनकी संप्रभुता को खतरा हो.
  • इस डील के साथ ही फिजी अब संयुक्त राज्य अमेरिका, न्यूजीलैंड और पापुआ न्यू गिनी के बाद ऑस्ट्रेलिया का चौथा ट्रीटी बाउंड सहयोगी बन गया है.

    ऑस्ट्रेलिया को चीन से किस बात का डर था?

    इसकी जड़ें साल 2022 में छिपी हैं. 2022 में चीन ने ऑस्ट्रेलिया के बेहद करीब स्थित सोलोमन द्वीप के साथ एक गुप्त सुरक्षा समझौता किया था. इस समझौते ने इस डर को जन्म दिया कि चीन भविष्य में सोलोमन द्वीप पर अपना स्थायी सैन्य बेस बना सकता है. अगर ऐसा होता, तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार ऑस्ट्रेलिया के दरवाजे पर किसी विरोधी देश की नौसेना तैनात हो जाती.

    चीन ने प्रशांत द्वीपों में अपनी पैठ बनाने के लिए चेकबुक डिप्लोमेसी (पैसे के दम पर प्रभाव बनाना) का जमकर इस्तेमाल किया है. बीजिंग ने प्रशांत महासागर के इन छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद अहम देशों में स्पोर्ट्स स्टेडियम, राष्ट्रपति भवन, बड़े अस्पताल और सड़कें बनाने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च किए हैं. चीन के इसी पैसे के लालच में आकर किरिबाती, सोलोमन द्वीप और नाउरू जैसे देशों ने ताइवान के साथ अपने दशकों पुराने कूटनीतिक रिश्ते तोड़ दिए और ‘वन चाइना पॉलिसी’ का समर्थन करते हुए बीजिंग का हाथ थाम लिया.

    फिजी का चीन से मोहभंग

    फिजी के चीन और ऑस्ट्रेलिया के साथ रिश्तों का इतिहास काफी दिलचस्प रहा है. पूर्व प्रधानमंत्री फ्रैंक बैनिमारामा के कार्यकाल में फिजी और चीन की काफी नजदीकियां बढ़ गई थीं. दरअसल, बैनिमारामा ने 2006 में एक सैन्य तख्तापलट के जरिए फिजी की सत्ता पर कब्जा किया था. इस तख्तापलट के बाद ऑस्ट्रेलिया और पश्चिमी देशों ने फिजी पर व्यापारिक और आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे. खुद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ता देख, बैनिमारामा ने आर्थिक मदद के लिए चीन का रुख किया और चीन ने इस मौके का फायदा उठाया.

    हालांकि, 2022 में फिजी की सत्ता में बदलाव हुआ और सित्वेनी राबुका प्रधानमंत्री बने. राबुका के सत्ता में आने के बाद से फिजी में चीन का प्रभाव लगातार कम हुआ है. राबुका ने स्पष्ट कर दिया कि फिजी अपने पारंपरिक सहयोगियों ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ ही चलना पसंद करेगा. 2025 में राबुका ने साफ कहा था कि फिजी कभी भी चीन को अपने यहां स्थायी सैन्य अड्डा बनाने की अनुमति नहीं देगा.

    ऑस्ट्रेलिया का कूटनीतिक पलटवार

    सोलोमन द्वीप में चीन की एंट्री के बाद ऑस्ट्रेलिया ने अपनी कूटनीतिक कोशिशों को युद्ध स्तर पर बढ़ा दिया है. फिजी से पहले ऑस्ट्रेलिया ने पापुआ न्यू गिनी, वानुअतु और तुवालु के साथ भी अहम सुरक्षा समझौते किए हैं. ऑस्ट्रेलिया ने वानुअतु के साथ जून 2026 सुरक्षा समझौते पर दस्तखत किए, जिसमें स्पष्ट रूप से इस प्रशांत राष्ट्र में किसी भी विदेशी सैन्य बेस की स्थापना पर रोक लगा दी गई है. यह सीधे तौर पर चीन के लिए एक ब्लॉक था.

    भारत के लिए डील के क्या हैं मायने?

    प्रशांत महासागर में हो रही यह उठापटक सिर्फ ऑस्ट्रेलिया और चीन तक सीमित नहीं है. इसका सीधा असर भारत के हितों पर भी पड़ेगा. आइए समझते हैं कैसे

    1. इंडो-पैसिफिक विजन और क्वाड (QUAD) की मजबूती

    भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया क्वाड के सदस्य हैं. क्वाड का मुख्य उद्देश्य ‘फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक’ सुनिश्चित करना है. अगर ऑस्ट्रेलिया प्रशांत क्षेत्र में चीन को सैन्य बेस बनाने से रोकता है, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से भारत के इंडो-पैसिफिक विजन की ही जीत है. चीन की नेवी अगर प्रशांत महासागर में उलझी रहती है और वहां हावी नहीं हो पाती, तो हिंद महासागर में भारत पर दबाव कम होता है.

    2. समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा

    प्रशांत महासागर से होकर दुनिया का एक बड़ा व्यापार गुजरता है. अगर चीन इन द्वीपीय देशों पर अपना सैन्य नियंत्रण स्थापित कर लेता, तो भविष्य में वह ग्लोबल सप्लाई चेन और समुद्री मार्गों को रूकावट पैदा कर सकता था. फिजी, वानुअतु और पपुआ न्यू गिनी का पश्चिमी देशों के साथ आना, व्यापारिक मार्गों की स्वतंत्रता के लिए एक अच्छी खबर है.

    3. भारत की अपनी कूटनीति (FIPIC) को समर्थन

    भारत खुद प्रशांत द्वीपीय देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहा है. ‘फोरम फॉर इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स कोऑपरेशन’ (FIPIC) के जरिए भारत इन देशों को स्वास्थ्य, आईटी, सोलर एनर्जी और जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर रहा है. PM मोदी पापुआ न्यू गिनी का दौरा भी कर चुके हैं. इस क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया की मजबूती, भारत के कूटनीतिक प्रयासों को भी एक सुरक्षित और अनुकूल माहौल प्रदान करती है.

    4. फिजी में भारतीय मूल का प्रभाव

    फिजी और भारत का रिश्ता गहरा और ऐतिहासिक है. फिजी की कुल आबादी में लगभग 37% से 40% लोग भारतीय मूल के हैं. फिजी में राजनीतिक और रणनीतिक स्थिरता सीधे तौर पर वहां रह रहे भारतीय प्रवासियों के हित में है. अगर फिजी चीन के कर्ज के जाल से बचकर ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकतांत्रिक देश के साथ रक्षा संबंध बनाता है, तो इससे वहां एक स्थिर और सुरक्षित माहौल बनेगा.

    फिजी का ऑस्ट्रेलिया के साथ मजबूती से खड़ा होना यह साबित करता है कि प्रशांत महासागर में चीन की राह अब आसान नहीं होने वाली है. दुनिया का शक्ति संतुलन अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में तय हो रहा है, और इसमें ऑस्ट्रेलिया का यह दांव मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है.

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