सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि वह देश में सभी चुनावों को एक साथ कराने की योजना बना रही है। इस संबंध में पीपी चौधरी की अध्यक्षता में एक संयुक्त संसदीय समिति विधेयक पर विचार कर रही है। इसके अंतर्गत लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों में वृद्धि का प्रस्ताव भी शामिल है। यदि यह योजना सफल होती है, तो यह आजादी के बाद का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक परिवर्तन होगा।
हाल ही में, 'एक देश, एक चुनाव' पर बनी समिति ने मीडिया को बताया कि इस योजना को 2034 में लागू किया जा सकता है। लेकिन 2029 में लोकसभा चुनाव के साथ कुछ राज्यों के चुनाव कराने की योजना है। पहले चरण में 2029 में चुनाव होंगे और दूसरे चरण के लिए 2031 का समय निर्धारित किया गया है।
दिल्ली सरकार के साथ बैठक में, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि वे विधानसभा का कार्यकाल छोटा करने के लिए तैयार हैं। हालांकि, यह केवल भाजपा शासित राज्यों तक सीमित नहीं है।
इस योजना के अनुसार, 2028 में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उन्हें रोक दिया जाएगा और विधानसभा का कार्यकाल कुछ समय के लिए बढ़ाया जाएगा। उदाहरण के लिए, कर्नाटक, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव 2029 में लोकसभा के साथ कराए जाएंगे।
भाजपा की राजनीतिक रणनीति को छोड़कर, 'एक देश, एक चुनाव' की आवश्यकता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। वर्तमान प्रणाली प्रभावी रूप से काम कर रही है। चुनावों के एक साथ होने से आचार संहिता लागू होगी, लेकिन इससे विकास कार्यों पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा।
अमेरिका का चुनावी मॉडल भी भारत के लिए एक विकल्प हो सकता है। वहां राष्ट्रपति चुनाव के साथ-साथ मिड टर्म चुनाव होते हैं, जिससे लोगों को अपनी राय व्यक्त करने का मौका मिलता है। भारत को भी इस मॉडल को अपनाने पर विचार करना चाहिए।