Ikka Review: अदालत के कटघरे में आमने-सामने आए सनी देओल-अक्षय खन्ना, दर्शकों का दिल जीत पाई 'इक्का'? पढ़ें रिव्यू
TV9 Bharatvarsh July 10, 2026 07:44 PM

Ikka Film Review: नेटफ्लिक्स पर जब कोई सस्पेंस थ्रिलर या लीगल ड्रामा दस्तक देता है, तब रिमोट उठाने से पहले दिल में एक एक्साइटमेंट होती है कि कुछ नया और धमाकेदार देखने को मिलेगा. लेकिन फिल्म ‘इक्का’ को देखने के बाद वो सारी एक्साइटमेंट ठंडी पड़ जाती है. महाराज जैसी दमदार फिल्म बनाने वाले डायरेक्टर सिद्धार्थ पी मल्होत्रा ने एक ऐसी फिल्म बनाई है जो खुद को सस्पेंस का किंग मानती है, लेकिन इसके सारे पत्ते पहले पंद्रह मिनट में ही खुल जाते हैं. फिल्म में सनी देओल की दहाड़ और अक्षय खन्ना का पुराना विलेन वाला स्वैग तो है, पर कहानी में वो दम ही नहीं है जो आपको बांधकर रख सके. अगर वन-लाइन में अपना फाइनल फैसला सुनाएं, तो ‘इक्का’ पूरी तरह से पिटा हुआ पत्ता है, जिसके झांसे में आकर अगर आपने रिमोट उठा लिया, तो फिल्म खत्म होने के बाद आप सिर्फ अपना कीमती समय और वीकेंड का डेटा वापस मांगेंगे. अगर आप भी सनी देओल और अक्षय खन्ना के इस कोर्टरूम कलेश की असली हकीकत जानना चाहते हैं, तो यह पूरा रिव्यू आखिर तक जरूर पढ़ें!

कहानी

सोमा (आकांक्षा रंजन कपूर) नाम की लड़की बड़े आराम से रईसजादे शौर्यमान (अक्षय खन्ना) के साथ नाइट आउट का मजा ले रही होती है. लेकिन, अगले ही पल कुछ ऐसा कलेश होता है कि उसे एक तेज रफ्तार लग्जरी गाड़ी से बाहर फेंक दिया जाता है. सोमा सड़क किनारे अधमरी हालत में मिलती है और ये मामला रातों-रात देश का सबसे बड़ा ‘हाई-प्रोफाइल’ केस बन जाता है, जिसमें राजनीति, पैसा और पावर शामिल है.

अब इस केस में एंट्री होती है हमारे अर्जुन (सनी देओल) की, जो शहर का सबसे मशहूर उसूलों वाला डिफेंस लॉयर है. अर्जुन जब काले कोट में कोर्टरूम के अंदर कदम रखते हैं, तो थियेटर में बैठे दर्शकों को सीधे 90 के दशक की कल्ट फिल्म ‘दामिनी’ वाले वकील गोविंद की याद आ जाती है. अर्जुन अपनी पहली ही बहस में भारी-भरकम डायलॉग मारता हैं कि कैसे ये अमीर और रसूखदार लोग कानून को अपनी जेब में रखकर घूमते हैं. वो वकीलों की इस छवि पर भी तंज कसता है कि लोग सोचते हैं वकील सिर्फ पैसे के पीछे भागते हैं, जबकि ऐसा नहीं है—वकील भी सच के लिए लड़ सकता है! यहां तक तो मामला एकदम टाइट लगता है. लेकिन ट्विस्ट ये है कि अर्जुन की पर्सनल लाइफ में फैले हुए रायते के चलते उसे ऐसे ही एक अमीरजादे की केस लड़नी पड़ती है.

दरअसल एक बड़े ट्रायल के दौरान उसकी बेटी की नाक से खून बहने लगता है. अब भाई, अगर आपने बचपन में थोड़ी-बहुत भी बॉलीवुड की रोने-धोने वाली फिल्में देखी हैं, तो डॉक्टर के मुंह से “इसे ऐसी जानलेवा बीमारी है जिसका इलाज सिर्फ माता-पिता के स्टेम सेल्स से हो सकता है” सुनने से पहले ही आप बीमारी का नाम और आगे का पूरा ड्रामा खुद ही प्रेडिक्ट (अंदाजा) कर लेंगे. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि अपनी बेटी के इलाज के भारी खर्चे और पुराने अतीत के चक्कर में अर्जुन को उसी शौर्यमान का केस लड़ना पड़ता है, जिससे वो नफरत करता है. इसके बाद अदालत के कटघरे में सबूतों से ज्यादा पुरानी दुश्मनी और आंसुओं का खेल शुरू हो जाता है, जिसे जानने के लिए आपको नेटफ्लिक्स पर ये फिल्म देखनी होगी.

कैसी है फिल्म?

‘इक्का’ की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसकी स्क्रिप्ट लिखने वाली टीम ने दर्शकों को बिल्कुल नासमझ मान लिया है. फिल्म के आखिरी एक घंटे में मेकर्स आपको चौंकाने के लिए इतने सारे ‘ट्विस्ट और टर्न’ फेंक-फेंक कर मारते हैं कि आपका सिर चकरा जाए. स्क्रीनप्ले बार-बार चीखकर कहता है,”जो देख रहे हो, उस पर शक करो!” लेकिन असली मजे की बात ये है कि जो ट्विस्ट क्लाइमेक्स में आने वाला होता है, वो दर्शक को एक मील दूर से ही साफ-साफ दिख रहा होता है. मेकर्स जिसे मास्टरस्ट्रोक समझकर परदे पर उतार रहे थे, वो सोशल मीडिया के जमाने में एक साधारण सा जोक बनकर रह गया है.

पूरी फिल्म देखने के बाद लगता है कि डायरेक्टर सिद्धार्थ पी मल्होत्रा एक ही कढ़ाही में सब कुछ पका देना चाहते थे. उन्हें कोर्टरूम का ड्रामा भी चाहिए था, मर्डर मिस्ट्री का सस्पेंस भी डालना था, बाप-बेटी का रोना-धोना भी दिखाना था और साथ ही साथ देश के रईसों पर सोशल कमेंट्री भी करनी थी. अब एक ही थाली में अगर आप बिरयानी, नूडल्स और गुलाब जामुन को मिक्स कर सब एक साथ परोस देंगे, तो स्वाद तो बिगड़ेगा ही ना बॉस! फिल्म हर दस मिनट में अपनी लेन बदलती रहती है, जिससे कहानी ग्रिपिंग (मजबूत) होने के बजाय बिखरी हुई और थकाऊ लगने लगती है.

डायरेक्शन

डायरेक्टर सिद्धार्थ पी मल्होत्रा का डायरेक्शन देखकर ऐसा लगता है कि वो खुद कन्फ्यूज थे कि वो सनी देओल की ‘दामिनी’ का पार्ट-2 बना रहे हैं या फिर आज के जमाने का कोई थ्रिलर. उन्होंने फिल्म के विजुअल्स तो अच्छे रखे हैं, लेकिन कहानी को कसने में उनका हाथ पूरी तरह ढीला रहा. खासकर जो इमोशनल सीन्स हैं, जहां लड़की की मां (ज्योति मुखर्जी) अर्जुन के सामने रोती है कि औलाद को खोने से बड़ा कोई दर्द नहीं होता. ये सीन्स इतने पुराने मिजाज के लगते हैं कि दर्शकों का दिल पिघलने के बजाय वो बोर होने लगते हैं. डायरेक्शन का पूरा ढांचा इतना लाउड है कि कोर्टरूम कम और मछली बाजार ज्यादा महसूस होता है.

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एक्टिंग

सनी देओल (अर्जुन) एक बार फिर वकील के काले कोट में जच तो रहे हैं. सबसे मजेदार बात ये है कि फिल्म में वो एक ऐसे रईसजादे के वकील बने हैं जिस पर रेप का आरोप है, लेकिन फिर भी पाजी अपने ‘कैरेक्टर’ से समझौता नहीं करते. वो कोर्ट में विक्टिम (पीड़ित लड़की) का कैरेक्टर असैसिनेशन (चरित्र हनन) नहीं होने देते और जब एक गवाह लड़की के बारे में बकवास करने की कोशिश करता है, तब सनी पाजी का वही पुराना 90 के दशक का ‘एंग्री यंग मैन’ जाग जाता है. वो कोर्टरूम में ऐसे दहाड़ते हैं कि जज साहब भी अपना हथौड़ा छुपा लें! पाजी को चिल्लाते देखना उनके फैंस के लिए मजेदार हो सकता है, पर इस में नयापन कुछ नहीं है.

अक्षय खन्ना (शौर्यमान) को देखकर तो ऐसा लगता है कि वो अपनी पुरानी फिल्म ‘धुरंधर’ के विलेन ‘रहमान डकैत’ के सेट से कपड़े बदलकर सीधे इस फिल्म में घुस आए हैं! वही डायलॉग बोलने के बीच में जानबूझकर लिया गया लंबा पॉज (विराम), तिरछी नजरों से देखना, थोड़ा झुककर चलना और चेहरे पर वो परमानेंट घमंड सब कुछ हुबहू सेम है. हद तो तब हो गई जब एक सीन में बैकग्राउंड डांसर भी अक्षय खन्ना का वो पुराना वायरल डांस स्टेप करता नजर आता है. मेकर्स ने एक्टिंग करवाने के बजाय उनके पुराने कैरेक्टर की पॉपुलैरिटी को जबरदस्ती भुनाने की कोशिश की है, जो इस उम्र में एक बिगड़ैल रईसजादे के रोल में थोड़ा अजीब लगता है.

तिलोत्तमा शोम (मधु बोस) की एंट्री कहानी में थोड़ी सी जान फूंकती है। वो कोर्ट में अपने हाथ में पट्टा (स्लिंग) बांधकर आती हैं और सनी पाजी के सामने मजाक में कहती हैं कि उनके पास भी ‘ढाई किलो का हाथ’ है. तिलोत्तमा ने अपनी कॉमिक और कड़क टाइमिंग से कोर्ट के सीन्स को थोड़ा सा दिलचस्प बनाया है.

बाकी महिला कलाकारों के किरदारों के साथ सरासर नाइंसाफी हुई है. तिलोत्तमा कोर्ट में जितनी कड़क हैं, घर आते ही उन्हें उसी ढर्रे वाली बंगाली बीवी बना दिया जाता है, जो साड़ी पहने, शंखा-पोला लगाए अपने बेरोजगार पति के लिए नाश्ता बना रही है. संजीदा शेख के पास करने के लिए कुछ खास नहीं था. वहीं दिया मिर्जा को बस एक ‘केयरिंग मां’ के स्टीरियोटाइप रोल में समेट दिया गया, जिनका काम सिर्फ अक्षय और सनी के किरदारों के बीच एक पुल का काम करना था.

देखें या नहीं

इक्का का हर दूसरा सीन इतना प्रेडिक्टेबल है कि आप अगली लाइन खुद बोल सकते हैं. बेटी की बीमारी वाला पूरा ट्रैक भयंकर घिसा-पिटा है. आज के दौर में जब दर्शक रियलिस्टिक और क्रिस्प ड्रामा पसंद करते हैं, फिल्म में 90 के दशक जैसा लाउड रोना-धोना ठूंसा गया है.
अक्षय खन्ना का पुराना विलेन वाला अंदाज और सनी देओल का वही चिल्लाने वाला मोड कुछ नया नहीं परोस पाता.

कुल मिलाकर कहें, तो ‘इक्का’ नाम सुनकर अगर आप ये सोचकर नेटफ्लिक्स पर लॉगिन कर रहे हैं कि आपको कोई शातिर और दिमाग की बत्ती जलाने वाला लीगल थ्रिलर देखने को मिलेगा, तो अपना कीमती डेटा और टाइम दोनों बचा लीजिए. ये ‘इक्का’ इतना बेदम है कि इसे देखने के बाद आप कहेंगे—’भाई, इससे अच्छा तो हम जोकर से ही काम चला लेते!’ नेटफ्लिक्स पर ही इससे कई गुना ज्यादा असली सस्पेंस, भयंकर ड्रामा और तगड़ा कलेश इन दिनों ‘लॉकअप’ में देखने को मिल जाता है, तो इस दो दशक पुरानी बासी कहानी पर अपना सिर क्यों फोड़ना? वहां तो बिना किसी घिसे-पिटे मेलोड्रॉमे के असली वाला एक्शन और एंटरटेनमेंट मिलता है! सनी देओल के फैंस उनके चिल्लाने वाले मोड को देखने के लिए इसे बैकग्राउंड में चलाकर घर का काम निपटा सकते हैं, बाकी तसल्ली से बैठकर देखने वाला ये इक्का बिल्कुल नहीं है.

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