भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश की मुद्रा को वैश्विक उथल-पुथल से बचाने के लिए एक बेहद शानदार और सोची-समझी रणनीति तैयार की है. डॉलर के मुकाबले रुपये को स्थिरता देने के लिए केंद्रीय बैंक ने 100 अरब डॉलर से अधिक का एक मजबूत रक्षा कवच (फॉरवर्ड पोजीशन) बनाया है. अब विदेशी निवेश बढ़ने और अंतरराष्ट्रीय हालात सुधरने के साथ, आरबीआई इस रणनीति को बहुत ही सधे हुए कदमों से संतुलित कर रहा है. बैंक की कोशिश है कि बाजार में बिना किसी उथल-पुथल के इस विदेशी मुद्रा प्रबंधन का पूरा फायदा आम आदमी और देश की अर्थव्यवस्था को मिले.
100 अरब डॉलर का ‘मास्टरप्लान’रुपये को मजबूती देने के लिए आरबीआई ने ‘शॉर्ट डॉलर फॉरवर्ड पोजीशन’ का बेहतरीन इस्तेमाल किया है. आसान भाषा में कहें तो यह भविष्य की एक तारीख पर डॉलर बेचने और रुपये खरीदने का कमिटमेंट है. इस स्मार्ट तरीके का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आरबीआई को तुरंत अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर खर्च नहीं करने पड़ते और रुपया भी सुरक्षित रहता है. ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के मुताबिक, मई महीने तक यह फॉरवर्ड बुक 106.7 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी.
इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों के केंद्रीय बैंक भी अपनी मुद्रा को संभालने के लिए ऐसे डेरिवेटिव्स का सहारा लेते हैं, लेकिन आरबीआई ने जिस रफ्तार से इसे लागू किया है, वह काबिले तारीफ है. इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च की एसोसिएट प्रोफेसर राजेश्वरी सेनगुप्ता बताती हैं कि यह कदम असल में भविष्य के लिए डॉलर की मांग को टालने जैसा है. बैंक अब बेहद सावधानी से इन सौदों का निपटारा करेगा, ताकि बाजार में विदेशी निवेश का सकारात्मक असर बना रहे. पिछले साल भी आरबीआई ने बिना किसी झटके के छह महीने में 35 अरब डॉलर के सौदों को सफलतापूर्वक निपटाया था, तब रुपये में केवल 0.8 प्रतिशत का मामूली बदलाव आया था.
विदेशी झटकों से अर्थव्यवस्था को रखा सुरक्षितपिछले कुछ समय से वैश्विक बाजार में काफी अस्थिरता रही है. साल 2025 में भारत पर लगाए गए अमेरिकी टैरिफ और इस साल की शुरुआत में मध्य पूर्व में हुए युद्ध के कारण पूरी दुनिया के बाजारों पर दबाव था. ऐसी मुश्किल परिस्थितियों में भी आरबीआई ने अपने इसी ‘फॉरवर्ड बुक’ के जरिए रुपये को एक मजबूत सुरक्षा कवच दिया.
अब हालात तेजी से सुधर रहे हैं. पिछले महीने भारत ने सरकारी बॉन्ड में विदेशी निवेश के नियम आसान किए और कर्ज पर रिटर्न पर टैक्स घटाया, जिससे बाजार में नई ऊर्जा आई है. अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम शांति समझौते से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है, जो भारत के लिए बहुत अच्छी खबर है. इन सकारात्मक स्थितियों का फायदा उठाते हुए, आरबीआई ने मध्य-जून से लेकर अब तक अपने विदेशी सौदों में 10 से 15 अरब डॉलर की सफल कटौती कर ली है. डीबीएस बैंक लिमिटेड के रणनीतिकारों के अनुसार, पिछले पखवाड़े में लगभग 20 बिलियन डॉलर की परिपक्वता (मैच्योरिटी) को बैंक ने शानदार तरीके से मैनेज किया है.
आगे की चुनौतियों के लिए फुल प्रूफ तैयारीआरबीआई हर स्थिति के लिए पूरी तरह से तैयार है. जून में हुई प्रेस ब्रीफिंग के दौरान आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने देश को आश्वस्त किया था कि बैंक को भविष्य में मुद्रा पर किसी बड़े दबाव की आशंका नहीं है. उन्होंने स्पष्ट किया कि आरबीआई के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार और मजबूत बफर मौजूद हैं. बाजार में पूंजी का प्रवाह सुचारू रखने के लिए हर जरूरी कदम उठाया जाएगा.
विदेशी पूंजी को और अधिक आकर्षित करने के लिए आरबीआई ने एक अहम कदम उठाया है. बैंक ने प्रवासी भारतीयों (NRI) से 3-5 साल के लिए विदेशी मुद्रा जमा जुटाने वाले बैंकों की हेजिंग लागत को पूरी तरह से कवर करने की पेशकश की है. सेबी के पूर्व बोर्ड सदस्य अनंत नारायण के मुताबिक, इस कदम से हमारा हेडलाइन विदेशी मुद्रा भंडार और मजबूत होगा. हालांकि यह भविष्य की देनदारियां भी बनाता है, लेकिन यह एक रणनीतिक कदम है.
अर्थशास्त्रियों को बाजार से बेहतर उम्मीदेंएमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की मुख्य अर्थशास्त्री माधवी अरोड़ा का कहना है कि आरबीआई की रणनीति में शॉर्ट-टर्म पोजीशन ज्यादा है. करीब 29 अरब डॉलर के सौदे तीन महीने में और 51 अरब डॉलर के सौदे एक साल के भीतर परिपक्व हो रहे हैं. आरबीआई के पास इसे मैनेज करने का पूरा खाका तैयार है.
हालांकि वैश्विक स्तर पर अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने (75 बेसिस पॉइंट तक की उम्मीद) की वजह से डॉलर मजबूत हो रहा है. यही कारण है कि 2024 में रुपया इंडोनेशियाई रुपिया के बाद थोड़ा दबाव में रहा है. ब्लूमबर्ग के सर्वे के अनुसार, इस साल के अंत तक रुपया 95.40 प्रति डॉलर के आसपास रह सकता है, जबकि बैंक ऑफ अमेरिका ग्लोबल रिसर्च का अनुमान है कि 2026 के अंत तक यह 98 के स्तर पर जा सकता है.