भारतीय जवानों ने न्यूजीलैंड के लिए क्यों लड़ी थी जंग? जहां पहुंचे पीएम मोदी
TV9 Bharatvarsh July 10, 2026 10:44 PM

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न्यूजीलैंड पहुंच गए हैं. न्यूजीलैंड भारत के लिए वर्षों से एक महत्वपूर्ण देश रहा है. भारतीय सैनिकों ने इस देश के लिए युद्ध तक लड़ा है. पीएम मोदी की यात्रा के बहाने जानते हैं कि इस युद्ध को इतिहास में किस नाम से जाना जाता है? क्यों भारतीय सैनिकों को इस जंग में हिस्सा लेना पड़ा और क्या रहा इस युद्ध का परिणाम? आइए, विस्तार से समझते हैं.

गैलीपोली युद्ध, प्रथम विश्व युद्ध का एक बहुत कठिन और महत्वपूर्ण अभियान था. यह युद्ध आधुनिक तुर्किये के गैलीपोली प्रायद्वीप में लड़ा गया था. इसमें भारत, ब्रिटेन, न्यूज़ीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और अन्य मित्र राष्ट्रों की सेनाएं शामिल थीं. भारतीय सैनिकों ने इस युद्ध में अद्भुत साहस दिखाया. वे ब्रिटिश भारतीय सेना के हिस्से के रूप में मित्र राष्ट्रों की ओर से लड़े थे. इस अभियान में न्यूज़ीलैंड के सैनिक भी उनके साथी थे. कई मोर्चों पर भारतीय, ऑस्ट्रेलियाई और न्यूज़ीलैंड के सैनिकों का उद्देश्य एक ही था. जीत.

गैलीपोली युद्ध कब लड़ा गया?

गैलीपोली युद्ध, प्रथम विश्व युद्ध का एक बहुत कठिन और महत्वपूर्ण अभियान था. यह अभियान जनवरी 1916 तक चला. मुख्य सैन्य कार्रवाई अप्रैल 1915 से दिसंबर 1915 के बीच हुई. मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने बाद में धीरे-धीरे अपने सैनिकों को वहाँ से निकाल लिया. अंतिम निकासी 9 जनवरी 1916 तक पूरी हुई. यह अभियान लगभग नौ महीने तक चला. इस दौरान सैनिकों को गोलियों, तोपों, बीमारी, गर्मी, ठंड, भूख और पानी की कमी से जूझना पड़ा.

गैलीपोली अभियान की शुरुआत 25 अप्रैल 1915 को हुई थी. फोटो: AI Pic

युद्ध कहां लड़ा गया?

यह युद्ध तुर्किये के पश्चिमी भाग में स्थित गैलीपोली प्रायद्वीप पर लड़ा गया. यह क्षेत्र डार्डानेल्स जलडमरूमध्य के पास है. डार्डानेल्स जलमार्ग बहुत महत्वपूर्ण था. यह भूमध्य सागर को काला सागर क्षेत्र से जोड़ता था. मित्र राष्ट्र इस रास्ते को अपने नियंत्रण में लेना चाहते थे. यदि यह मार्ग खुल जाता, तो रूस तक समुद्री सहायता पहुंचाना आसान हो सकता था. उस समय रूस भी जर्मनी और उसके सहयोगियों के खिलाफ युद्ध लड़ रहा था.

युद्ध किनके बीच हुआ?

गैलीपोली में एक ओर मित्र राष्ट्र थे. इनमें ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, भारत और कई अन्य क्षेत्रों के सैनिक शामिल थे. दूसरी ओर उस्मानी साम्राज्य, यानी ओटोमन साम्राज्य की सेना थी. उस समय ओटोमन साम्राज्य जर्मनी के साथ था. तुर्की सैनिक अपने देश की रक्षा के लिए लड़ रहे थे. वे अपने भूगोल से परिचित थे. उन्हें ऊंची पहाड़ियों, संकरी घाटियों और मजबूत रक्षा चौकियों का लाभ मिला.

युद्ध क्यों लड़ा गया?

मित्र राष्ट्रों का मुख्य उद्देश्य डार्डानेल्स जलमार्ग को जीतना था. वे इस्तांबुल तक पहुंचने का रास्ता बनाना चाहते थे. उस समय इस्तांबुल ओटोमन साम्राज्य की राजधानी था. मित्र राष्ट्रों को उम्मीद थी कि यदि तुर्की पर दबाव बढ़ेगा, तो वह युद्ध से बाहर हो सकता है, लेकिन योजना जितनी आसान दिखती थी, जमीन पर उतनी ही कठिन साबित हुई. समुद्री हमला पहले सफल नहीं हुआ. इसके बाद सैनिकों को तट पर उतारकर लड़ाई शुरू की गई.

अब गैलीपोली प्रायद्वीप कुछ ऐसा दिखता है, तस्वीर 2025 की है. फोटो: Getty Images

इस युद्ध का नेतृत्व किसने किया?

मित्र राष्ट्रों की ओर से गैलीपोली अभियान का प्रमुख नेतृत्व ब्रिटिश जनरल सर इयान हैमिल्टन के पास था. वे भूमध्यसागरीय अभियान बल के कमांडर थे. न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के सैनिकों को सामान्य रूप से एएनज़ैक कहा जाता था. एएनज़ैक का अर्थ ऑस्ट्रेलियन एंड न्यूज़ीलैंड आर्मी कॉर्प्स है.

ओटोमन सेना की रक्षा का नेतृत्व जर्मन जनरल ओटो लिमान फॉन सैंडर्स ने किया. तुर्की के एक प्रमुख सैन्य अधिकारी मुस्तफ़ा कमाल भी इस युद्ध में बहुत महत्वपूर्ण रहे. बाद में वही मुस्तफ़ा कमाल आधुनिक तुर्किये के संस्थापक नेता अतातुर्क बने. भारतीय सैनिक ब्रिटिश भारतीय सेना की अलग-अलग टुकड़ियों में थे. गैलीपोली में 29वीं भारतीय ब्रिगेड और 14वीं फिरोजपुर सिख रेजिमेंट का उल्लेख विशेष रूप से किया जाता है.

भारतीय सैनिक गैलीपोली में क्यों भेजे गए?

उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था. भारतीय सेना ब्रिटिश साम्राज्य की सेना का बड़ा हिस्सा थी. प्रथम विश्व युद्ध में भारत से लाखों सैनिक विभिन्न मोर्चों पर भेजे गए. कुछ सैनिक यूरोप गए, कुछ अफ्रीका गए, कुछ पश्चिम एशिया और मिस्र गए. गैलीपोली में भारतीय सैनिकों को इसलिए भेजा गया क्योंकि वे अनुभवी थे. कई भारतीय रेजिमेंटों को पहाड़ी इलाकों, कठिन मौसम और दुर्गम स्थानों में काम करने का अनुभव था. भारतीय सैनिकों में सिख, पंजाबी मुसलमान, गोरखा, पठान और अन्य समुदायों के जवान शामिल थे. उन्होंने अपनी सैन्य परंपरा और अनुशासन का शानदार परिचय दिया.

भारतीय सैनिक किन मोर्चों पर लड़े?

भारतीय सैनिक मुख्य रूप से गैलीपोली के दक्षिणी क्षेत्र में लड़े. यह क्षेत्र केप हेल्स या हेल्स मोर्चे के नाम से जाना जाता था. यहां लड़ाई बहुत भयंकर थी. सैनिकों को खुली जमीन पर आगे बढ़ना पड़ता था. सामने से मशीनगनों और तोपों की आग आती थी. खाइयों की लड़ाई आम थी. एक ओर मित्र राष्ट्रों की खाइयां थीं. दूसरी ओर तुर्की सेना की खाइयां थीं. कई स्थानों पर दोनों पक्षों के बीच दूरी बहुत कम थी. भारतीय सैनिकों को कई बार मजबूत तुर्की मोर्चों पर हमला करने का आदेश मिला. उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन उन्होंने पीछे हटने के बजाय बहादुरी से मोर्चा संभाला.

न्यूजीलैंड पहुंचे पीएम मोदी

Reached Auckland a short while ago. Thankful to Prime Minister Luxon for the welcome at the airport.

This visit is historic, being the first Prime Ministerial visit to New Zealand in four decades. I look forward to holding talks with Prime Minister Luxon and discussing the pic.twitter.com/qhUfkaFfHF

— Narendra Modi (@narendramodi) July 10, 2026

14वीं फिरोजपुर सिख रेजिमेंट की वीरता

14वीं फिरोजपुर सिख रेजिमेंट ने गैलीपोली में महान साहस दिखाया. उनके सैनिकों ने कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़कर हमला किया. जून 1915 में क्रिथिया क्षेत्र के पास हुई लड़ाइयों में सिख सैनिकों को भारी क्षति हुई. फिर भी उन्होंने अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने का प्रयास जारी रखा. कई सैनिक घायल होने के बाद भी लड़ते रहे. अनेक जवान शहीद हुए. उनकी बहादुरी ने ब्रिटिश भारतीय सेना की प्रतिष्ठा बढ़ाई. गैलीपोली में सिख सैनिकों का योगदान आज भी सैन्य इतिहास में याद किया जाता है. उनका बलिदान केवल एक रेजिमेंट की कहानी नहीं है. यह उन भारतीय सैनिकों की कहानी है जो बहुत दूर विदेशी धरती पर लड़े.

न्यूज़ीलैंड के सैनिकों से क्या संबंध था?

न्यूज़ीलैंड के सैनिक गैलीपोली अभियान के प्रमुख भाग थे. उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों के साथ एएनज़ैक मोर्चे पर लड़ाई लड़ी. भारतीय सैनिक और न्यूज़ीलैंड के सैनिक एक ही मित्र राष्ट्र गठबंधन का हिस्सा थे. वे अलग-अलग क्षेत्रों में तैनात रहे, लेकिन उनका सैन्य उद्देश्य समान था. इसलिए भारतीय सैनिकों की कहानी को न्यूज़ीलैंड की गैलीपोली स्मृति से अलग नहीं देखा जा सकता. दोनों देशों के सैनिकों ने एक बड़े युद्ध अभियान में अपना योगदान दिया. यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य जान लेना जरूरी है कि भारतीय सैनिक न्यूज़ीलैंड की स्वतंत्र सेना के अधीन नहीं लड़े थे. वे ब्रिटिश भारतीय सेना के सैनिक थे और ब्रिटिश कमान के अंतर्गत लड़ रहे थे.

गैलीपोली अभियान का परिणाम

गैलीपोली अभियान मित्र राष्ट्रों के लिए सफल नहीं रहा. वे डार्डानेल्स पर नियंत्रण नहीं कर सके. उन्हें अंततः अपने सैनिक वापस निकालने पड़े. फिर भी इस युद्ध ने कई देशों के इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला. न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में गैलीपोली को राष्ट्रीय पहचान के महत्वपूर्ण क्षण के रूप में देखा जाता है. तुर्किये में भी यह युद्ध राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बना. मुस्तफ़ा कमाल की प्रतिष्ठा इसी अभियान से बहुत बढ़ी. भारत के लिए भी यह अभियान महत्वपूर्ण है. भारतीय सैनिकों ने अपनी बहादुरी, अनुशासन और बलिदान से विश्व युद्ध के इतिहास में अपनी जगह बनाई.

भारतीय सैनिकों की विरासत

गैलीपोली में भारतीय सैनिकों का योगदान लंबे समय तक कम चर्चा में रहा. लेकिन अब इतिहासकार और शोधकर्ता उनके बलिदान को अधिक महत्व दे रहे हैं. इन सैनिकों ने एक ऐसे युद्ध में हिस्सा लिया जो उनके अपने देश से बहुत दूर था. फिर भी उन्होंने कठिन परिस्थितियों में अपने साथियों का साथ नहीं छोड़ा. उनकी कहानी साहस, कर्तव्य और बलिदान की कहानी है. गैलीपोली युद्ध हमें याद दिलाता है कि प्रथम विश्व युद्ध केवल यूरोपीय देशों का संघर्ष नहीं था. इसमें भारत के सैनिकों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

यह भी पढ़ें:भारत के 500 रुपए न्यूजीलैंड में जाकर कितने हो जाते हैं? जहां पहुंचे PM मोदी

© Copyright @2026 LIDEA. All Rights Reserved.