Sawan 2026: सावन में कांवड़ में जल लाने का रहस्य, जानिए क्यों सदियों से निभाई जा रही है यह परंपरा
TV9 Bharatvarsh July 13, 2026 03:43 PM

Kanwar Yatra History: सावन के महीने की शुरुआत होते ही चारों तरफ बम-बम भोले और हर-हर महादेव के जयकारे गूंजने लगते हैं. कंधों पर कांवड़ उठाए और नंगे पैर मीलों का सफर तय करते शिवभक्तों का उत्साह देखते ही बनता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि सावन के पवित्र महीने में कांवड़ में गंगाजल लाने की इस परंपरा के पीछे का असली रहस्य क्या है? आखिर क्यों सदियों से करोड़ों लोग इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं? आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा के बारे में.

कब से शुरू होगा सावन 2026?

पंचांग के अनुसार, साल 2026 में सावन का पवित्र महीना 30 जुलाई से शुरू होगा और 28 अगस्त को समाप्त होगा. इस पूरे महीने भगवान शिव की पूजा, व्रत, रुद्राभिषेक और कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व रहता है.

समुद्र मंथन से जुड़ा है कांवड़ यात्रा का रहस्य

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया तो सबसे पहले हलाहल नाम का भयंकर विष निकला. इस विष की अग्नि इतनी प्रचंड थी कि उससे पूरी सृष्टि संकट में पड़ गई. तब भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए उस विष का पान कर लिया. माता पार्वती ने विष को भगवान शिव के कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए. हालांकि विष के प्रभाव से उनके शरीर में असहनीय गर्मी और जलन पैदा हो गई.

भगवान शिव को शीतलता देने के लिए किया गया जलाभिषेक

मान्यता है कि भगवान शिव के शरीर की जलन को शांत करने के लिए देवताओं ने गंगा सहित पवित्र नदियों का जल लाकर उनका अभिषेक किया. इससे महादेव को शीतलता मिली और विष का प्रभाव भी कम हुआ. इसी घटना के बाद भगवान शिव को जल अर्पित करने की परंपरा शुरू हुई. कहा जाता है कि सावन में कांवड़ में पवित्र जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाने से वही पुण्य प्राप्त होता है जो देवताओं ने भगवान शिव की सेवा करके पाया था.

सावन में ही क्यों होती है कांवड़ यात्रा?

धार्मिक मान्यता है कि सावन का महीना भगवान शिव को सबसे अधिक प्रिय है. इस दौरान प्रकृति भी हरियाली से भर जाती है और वातावरण में शीतलता रहती है. इसलिए इस महीने भगवान शिव का जलाभिषेक करने का विशेष फल मिलता है. मान्यता है कि सावन में श्रद्धा और नियम के साथ कांवड़ यात्रा करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. भगवान शिव उनकी परेशानियों को दूर करते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.

कांवड़ यात्रा को तपस्या क्यों माना जाता है?

कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं बल्कि आस्था, अनुशासन और आत्मसंयम का प्रतीक भी है. कांवड़िए कई किलोमीटर तक पैदल चलकर पवित्र जल लाते हैं. इस दौरान वे सात्विक भोजन करते हैं, ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, क्रोध और नकारात्मक विचारों से दूर रहते हैं तथा भगवान शिव के नाम का लगातार जाप करते हैं. यही कारण है कि इस यात्रा को कठिन तपस्या के समान माना जाता है. श्रद्धा और नियम के साथ की गई यह साधना भगवान शिव को बहुत ही प्रिय मानी गई है.

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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