ब्रिटिश सरकार भारत को क्यों नहीं लौटाएगी सरस्वती प्रतिमा और कोहिनूर हीरा?
Webdunia Hindi July 22, 2026 05:43 PM


-लंदन से लौटकर रमण रावल

Dhar Bhojshala Vagdevi Statue: धार की भोजशाला से ब्रिटेन ले जाई गई जिस वाग्देवी (मां सरस्वती) की मूर्ति को वापस पाने के लिये करोड़ों लोगों की भावनाओं के परिप्रेक्ष्य में भारत सरकार अथक प्रयास करती रही है और लेकिन न तो ब्रिटिश कानून इसकी अनुमति देता है, न ही वहां की सरकार 6 महाद्वीपों से ले जाई गई कोई भी पुरातात्विक वस्तु वापस करने में दिलचस्पी रखती है। याद रहे, 15 मई को मप्र उच्च न्यायालय ने धार की विवादित जगह को निर्विवाद रूप से भोजशाला मानते हुए फैसला सुनाया है। उसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील तो की गई है, लेकिन फैसले पर कोई रोक नहीं लगी है।

 

इस तथ्य से भारतीयों की भावनाओं को ठेस पहुंच सकती है, लेकिन इस सच को तथ्यों के प्रकाश में अब स्वीकार कर लेना ही नियति है। इसकी वजह साफ है, क्योंकि हाल ही के लंदन प्रवास में मुझे यह जानने में आया कि ब्रिटिश संग्रहालय अधिनियम 1963 के अनुसार वहां का कानून इस बात की अनुमति नहीं देता कि किसी भी देश की सांस्कृतिक धरोहर, कलाकृति या वस्तु को उसके मूल देश को लौटा सकें। उल्लेखनीय है कि 15 मई को इंदौर उच्च न्यायालय के फैसले बाद इस मांग ने एक बार फिर जोर पकड़ा कि लंदन म्यूजियम से सरस्वती प्रतिमा वापस लाना चाहिए।

 

भोजशाला का फैसला 15 मई को आया और मैं 17 मई को ब्रिटिश म्यूजियम देखने इसी मंशा से पहुंचा कि सरस्वती प्रतिमा व कोहिनूर हीरे को देखा जाए। प्रतिमा ब्रिटिश म्यूजियम में है, जबकि कोहिनूर टॉवर ऑफ लंदन में है। म्यूजियम में मूर्तियां, आर्टिफेक्ट्स, हथियार व अन्य साजोसामान है तो टॉवर ऑफ लंदन में ब्रिटिश शासन का शाही आभूषण व साजो-सामान है। ALSO READ: London Trip: प्रधानमंत्री से पब्लिक तक मेट्रो, सिटी बस में सफर करते हैं

 

ब्रिटिश म्यूजियम में चीन व दक्षिण एशिया वाले भाग में भारत व पड़ोसी देशों की वस्तुएं हैं। यहां सरस्वती, अंबिका व विद्यादेवी की प्रतिमाएं पास-पास रखी हैं। इनके वर्णन भ्रम पैदा करने वाले तो हैं ही, वह अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति का एक और उदाहरण है। वहां जिस प्रतिमा पर अंबिका का होना लिखा है, उसके संक्षिप्त वर्णन में बताते हैं कि इसे हिंदू व जैन दोनों ही पूजते हैं। मूर्ति के एक हाथ में कलम स्पष्ट दिखती है, जो ज्ञान का प्रतीक है, जो देवी सरस्वती हैं। यह प्रतिमा 1909 में ब्रिटिश सेना के भारत स्थित तत्कालीन मेजर जनरल डब्ल्यू किनसाइ्ड ने दान की थी, जिन्हें भोजशाला से प्राप्त होना ही बताया है। वहां सभी कृतियों के साथ दान देना ही बताया गया है। 1961 में भारत के प्रख्यात पुरात्तवेत्ता डॉ.विष्णु श्रीधर वाकणकर ने ब्रिटिश म्यूजियम के भ्रमण के दौरान जिस मूर्ति को सरस्वती प्रतिमा सत्यापित किया था, वह यही है।

इसके ठीक पास एकसाथ दो मूर्तियां प्रदर्शित हैं। इनमें पहली को विद्यादेवी व दूसरी को सरस्वती लिखा है। विद्यादेवी के लिए लिखा है कि एक हाथ में कलम व नीचे उनका सेवक दवात लेकर खड़ा है। ये दोनों मूर्तियां राजस्थान से प्राप्त होना लिखा है। इस तरह से जन सामान्य अंबिका, सरस्वती व विद्यादेवी लिखा होने से भ्रमित होता रहता है कि आखिरकार वाग्देवी की मूर्ति कौन-सी है? जबकि इस बारे में डॉ. वाकणकर की दृष्टि और विवेचना पर कभी संदेह नहीं किया जा सकता। ALSO READ: Trip To London : लंदन में न सड़क पर धरने-प्रदर्शन, न चक्का जाम

 

इस संबंध में दो उल्लेखनीय तथ्य सामने आए हैं। पहला तो यह कि तत्कालीन ब्रिटिश हाई कमिश्नर निकोसल फेन अक्टूबर 1992 के तीसरे हफ्ते में मांडव घूमने आए थे। तब धार कलेक्टर वीसी रावत थे। सेवानिवृत्ति के बाद वे इस समय इंदौर में रह रहे हैं। रावत ने बताया कि अपनी प्रशासनिक मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए उन्होंने मांडव विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष प्रेमप्रकाश खत्री को साथ लेकर वाग्देवी प्रतिमा लौटाने संबंधी पत्र हाई कमिश्नर को दिया था। उनकी ओर से मुझे ही संबोधित करते हुए 13 अप्रैल 1993 को उनका जवाब आया। उन्होंने लिखा था- आधुनिक भारतीय विद्वता मूर्ति की सरस्वती के रूप में पहचान पर सवाल उठाती है और सुझाव देती है कि इसके बजाय यह जैन देवी अंबिका हो सकती है। मैं निश्चित रूप से विद्वानों के गुणों को आंकने में काफी अक्षम हूं, लेकिन यह स्पष्ट है कि जब तक मूर्ति की पहचान विवादास्पद है, तब तक इसे वापस करने की कोई आशा नहीं है। यह दरअसल, बेहद कूटनीतिक और टालमटोल करने वाला जवाब ही था और उस व्याख्या से बिल्कुल अलग नहीं था, जो ब्रिटिश संग्रहालय में मूर्ति के साथ वर्णित है। ALSO READ: London Trip: सड़कें संकरी, फुटपाथ चौड़े, फिर भी जाम नहीं लगता

 

इस संबंध में दूसरा तथ्य मायने रखता है। ब्रिटिश इतिहासकार मेजर चार्ल्स एकफोर्ड लुआर्ड ने 1912 में एक पुस्तक लिखी है- धार एंड मांडू-ए स्कैच फॉर द साइट सीर (धार व मांडू-पर्यटकों, दर्शकों के लिए एक संक्षिप्त रूपरेखा)। इसका प्रकाशन इलाहाबाद के बिशंभर नाथ भार्गव ने स्टैंडर्ड प्रेस के तहत किया था। इसमें लुआर्ड ने तत्कालीन इतिहासकार के.के. लेले के निष्कर्षों से सहमत होते हुए लिखा- नक्काशीदार खंबे व नक्काशी वाली छतें जैसी निर्माण सामग्रियां स्पष्ट रूप से इस स्थान पर एक हिंदू मंदिर की ओर इशारा करती हैं, जिसे बाद में कमाल मौला मस्जिद के रूप में रूपांतरित किया गया। लुआर्ड ने इस स्थान पर मिली भौतिक खोजों को एक व्यापक संदर्भ में प्रस्तुत किया। हालांकि बाद में विद्वानों ने यह स्पष्ट किया कि वाग्देवी की प्रतिमा वास्तव में भोजशाला के आंगन की बजाय पुराने महल के पास मलबे से बरामद की गई थी। जैसा कि मुगलों के इतिहास में अनेक घटनाएं बताती हैं कि वे मंदिरों को बुरी तरह ध्वस्त कर मूर्तियों को खंडित कर दिया करते थे। ऐसे में वाग्देवी की मूर्ति को कहीं फेंक देना सामान्य बात है।

 

चूंकि लुआर्ड ब्रिटिश मेजर थे और अध्ययन-लेखन में उनकी रुचि थी तो उन्होंने स्वयं धार, मांडू का भ्रमण कर तथ्य जुटाए थे, जो प्रामाणिक माने जा सकते हैं। साथ ही ब्रिटिश हाई कमिश्नर की ओर से तत्कालीन धार कलेक्टर को लिखा पत्र दर्शाता है कि ब्रिटेन सरकार की मंशा कभी-भी वाग्देवी प्रतिमा को लौटाने की नहीं रही। इसीलिए सरकार के प्रयास बेनतीजा रहने ही थे।

दरअसल, ब्रिटिश संग्रहालय अधिनियम 1963 में यह स्पष्ट उल्लेख है कि ब्रिटिश कॉलोनी (जिन देशों को गुलाम बनाकर वहां शासन किया, उसे ये कॉलोनी मानते हैं) में कहीं से भी लाई गई किसी भी कलाकृति या वस्तु को वापस नहीं किया जा सकता। यदि कोई भी सामग्री क्षतिग्रस्त हो गई हो या उसे संग्रह में रखना अनुपयुक्त हो तो ही इसे हटाया जा सकता है। वैसे ब्रिटेन का कानून अधिकतम तीन साल के लिए किसी वस्तु को संबंधित देश में ले जाकर प्रदर्शन की अनुमति देता है, लेकिन जैसा कि इस तरह के मामलों में होता है, यह अनुमति बेहद सीमित अपवाद स्वरूप ही दी जाती है। वह भी बेशकीमती वस्तुओं को छोड़कर। ब्रिटिश संस्कृति मंत्रालय इसके लिए अस्थायी निर्यात लाइसेंस देता है, वह भी भारी-भरकम गारंटी के बाद।

 

इस संग्रहालय से अभी तक किसी वस्तु को वापस किए जाने का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। इस बारे में मई 2019 में ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन संस्कृति सचिव जेरेमी राइट ने एक साक्षात्कार में बेहद स्पष्ट रूप से कहा था कि लूटे हुए आर्टिफेक्ट्स को यदि पुनर्स्थापित करने के लिए उनके मूल देशों को लौटाना प्रारंभ कर दें तो दुनिया में ऐसा एक भी स्थान नहीं रहेगा, जहां कोई भी व्यक्ति ये सारी चीजें एकसाथ देख सके। उन्होंने यह भी कहा था कि ब्रिटेन सरकार ऐसा कोई भी संशोधन करने नहीं जा रही।

 

ब्रिटिश म्यूजियम में दुनिया भर से लाई गई 80 लाख से अधिक वस्तुएं संग्रहित हैं। इनमें से चुनिंदा ही प्रदर्शित हैं, शेष अध्ययन के लिए हैं या उनका भंडारण किया गया है। ये वस्तुएं 6 महाद्वीपों से लाई गई थीं, जिनमें भारत, मिस्र, ग्रीस, इटली, चीन, इराक, इरान, नाइजीरिया, पेरू प्रमुख हैं। इस विशाल संग्रह के आधार पर मानव सभ्यता का प्राचीन इतिहास पता चलता है। इनमें आदिम युग के औजार, उपयोग की वस्तुएं, चित्र, मूर्तियां, घरेलू कामकाज की चीजें शामिल हैं।  

 

इसी तरह से टॉवर ऑफ लंदन में कोहिनूर हीरे को भी देखा, जिसे लेकर कोई संशय कभी रहा ही नहीं। उसकी छंटा वाकई निराली है। 105 कैरेट के इस हीरे को देखकर मन नहीं भरता। वैसे यह 185 कैरेट का था, जिसकी आभा कमजोर होने पर फिर से तराशा तो यह 105 कैरेट का रह गया। इसे 1850 में भारत की गोरी हुकूमत ने ब्रिटेन महारानी विक्टोरिया को भेंट किया था। इस गैलरी में फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी नहीं की जा सकती। वहां ब्रिटिश राजशाही समेत अनेक देशों के राजमुकुट प्रदर्शित हैं, जिनके बारे में यह भी बताया जाता है कि कब किस राजा या महारानी ने किसे कब राज्यारोहण के समय पहना था।

इन्हें मद्धिम रोशनी में ही निहारा जा सकता है। यहां गोरी हुकूमत ने शासित देशों से लूटे हुए राजशाही के खजानों के अलावा ब्रिटेन के तमाम महाराजा-महारानियों के वे बेशकीमती आभूषण, रत्न भी हैं, जो वे अपने राजतिलक, शादी, समारोहों में उपयोग करते रहे हैं। साथ ही सोने का राजदंड, स्वर्ण मंडित व अनमोल रत्नों से सजी तलवारें और अनगिनत राजशाही की प्रतीक वस्तुएं भी हैं। जिनमें स्वर्ण क्रॉकरी, भोजन परोसने के स्वर्ण बर्तन, बड़े आकार के शो पीसेस भी वहां हैं। इस संग्रहालय में दुनिया भर से लाए गए अत्यंत नायाब, महंगे व अनोखी छंटा वाले 23 हजार 678 रत्न संग्रहित हैं। इनमें भारत व अफ्रीका से लाए रत्नों की तादाद अधिक है। कोहिनूर समेत अन्य बेशकीमती खजाने की जानकारी देने वाली स्लाइड भी चलती रहती है।

 

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