मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बीजेपी विधायक संजय सत्येंद्र पाठक के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेकर शुरू की गई आपराधिक अवमानना क्रिमिनल कंटेम्प्ट कार्रवाई का निपटारा करते हुए उनकी बिना शर्त माफी स्वीकार कर ली है. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी भी लंबित मामले से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े व्यक्ति को उस मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश से मिलने फोन करने या संदेश भेजने का प्रयास नहीं करना चाहिए.
अदालत ने इसे आपराधिक अवमानना की श्रेणी में माना, लेकिन यह भी कहा कि इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया में इतनी गंभीर बाधा पैदा नहीं हुई कि दंड दिया जाए. इसलिए विधायक की बिना शर्त माफी स्वीकार करते हुए उन्हें भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न दोहराने की कड़ी चेतावनी दी गई.
कैसे हुई मामले की शुरुआत?इस मामले की शुरुआत आशुतोष दीक्षित द्वारा दायर एक रिट याचिका से हुई थी. याचिका में 31 जनवरी 2025 की शिकायत पर कानून के अनुसार जांच पूरी कर एफआईआर दर्ज करने के निर्देश देने की मांग की गई थी. शिकायत में संजय सत्येंद्र पाठक से जुड़ी तीन कंपनियों पर अवैध खनन कर राज्य सरकार को लगभग 1200 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया गया था. इस याचिका की सुनवाई 1 सितंबर 2025 को हुई. उस दौरान संबंधित न्यायाधीश ने आदेश में जिक्र किया कि संजय पाठक ने इस मामले को लेकर उनसे चर्चा करने के लिए फोन करने का प्रयास किया है. इसी कारण उन्होंने खुद को मामले की सुनवाई से अलग करते हुए प्रकरण को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष उपयुक्त पीठ के गठन के लिए भेज दिया.
इसके बाद आशुतोष दीक्षित ने एक और याचिका दायर कर इस घटना पर न्यायिक संज्ञान लेने की मांग की. 2 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने रजिस्ट्री को संजय सत्येंद्र पाठक के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेकर आपराधिक अवमानना का मामला दर्ज करने का निर्देश दिया. अदालत ने नोटिस जारी कर विधायक से स्पष्टीकरण मांगा और उन्हें व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश भी दिए. इस बीच आशुतोष दीक्षित ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया, लेकिन विशेष अनुमति याचिका वापस लेने के बाद उनका हस्तक्षेप आवेदन भी हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया. हालांकि उन्हें अदालत की मदद करने की अनुमति दी गई.
विधायक ने बिना शर्त मांगी माफीविधायक संजय सत्येंद्र पाठक ने अपने जवाब में बिना शर्त माफी मांगते हुए कहा कि लगभग 30 अगस्त 2025 को उनसे गलती से न्यायाधीश विशाल मिश्रा को कॉल लग गई थी, जिसे उन्होंने तुरंत काट दिया. इसके बाद केवल परिचय देने के उद्देश्य से एक संदेश भेजा गया था. उनका कहना था कि न्यायाधीश से किसी भी प्रकार की बातचीत नहीं हुई और न ही उनका न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का कोई इरादा थ.। उन्होंने अदालत के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त करते हुए अपनी भूल पर खेद और पश्चाताप भी जताया. उनके वरिष्ठ अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि अगर गलती अनजाने में हुई हो और आरोपी ईमानदारी से बिना शर्त माफी मांग रहा हो तो अदालत माफी स्वीकार कर सकती है.
कोर्ट ने माफीनामे को किया स्वीकारखंडपीठ ने अवमानना अधिनियम 1971 की धारा 2(सी), 12 और 13 का जिक्र करते हुए कहा कि न्यायाधीश को फोन करना और उसके बाद संदेश भेजना न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की श्रेणी में आता है. अदालत ने यह भी कहा कि संजय पाठक ने इस तथ्य से इनकार नहीं किया कि कॉल किया गया था बल्कि उसे अपनी गलती मानते हुए माफी मांगी है. हालांकि अदालत ने यह भी पाया कि इस घटना से न्यायिक प्रक्रिया में वास्तविक या गंभीर बाधा पैदा नहीं हुई, इसलिए कानून के प्रावधानों और बिना शर्त माफी को देखते हुए उन्हें दंडित करने के बजाय उनकी माफी स्वीकार करना उचित होगा.
अपने अंतिम आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि जनप्रतिनिधियों से कानून और न्यायपालिका के प्रति अधिक जिम्मेदार आचरण की अपेक्षा की जाती है. इसलिए संजय सत्येंद्र पाठक की बिना शर्त माफी स्वीकार की जाती है, लेकिन उन्हें स्पष्ट चेतावनी दी जाती है कि भविष्य में वो इस प्रकार का कोई भी आचरण दोबारा न करें. इसी के साथ अदालत ने स्वत: संज्ञान से शुरू हुई आपराधिक अवमानना की कार्रवाई खत्म कर दी.
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