सरकार अपने कच्चे तेल के बिल को कम करने और इंपोर्ट की निर्भरता को कम करने के लिए देश में कच्चे तेल की खोज में जुट गई है. इसके लिए सरकार की ओर से 80 हजार करोड़ रुपए का मास्टरप्लान तैयार किया है. मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के मुताबिक, पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्रालय भारत में गहरे समुद्र में तेल और गैस की खोज में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए 80,000 करोड़ रुपए का इंसेंटिव पैकेज तैयार कर रहा है. इसके तहत खोज वाले कुओं की ड्रिलिंग का आधा खर्च सरकार उठाएगी.
क्या है सरकार की प्लानिंग?‘नेशनल डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन मिशन’ या ‘समुद्र मंथन’ के तहत शुरू की गई यह पहल, पिछले दशक में किए गए अपस्ट्रीम रिफॉर्म्स से कहीं आगे की चीज है. वे सुधार ग्लोबल ऑयल कंपनियों से बड़ा निवेश लाने में नाकाम रहे थे, जबकि यह नई पहल खोज के खर्च का कुछ हिस्सा सीधे तौर पर फंड करेगी. इस प्रस्ताव के तहत, सरकार गहरे पानी में खोज वाले कुएं (deepwater exploratory wells) खोदने की कॉस्ट का 50% तक हिस्सा वापस करेगी. इस प्रस्ताव पर दूसरे मंत्रालयों के साथ बातचीत चल रही है और कैबिनेट के सामने पेश किए जाने से पहले इसमें बदलाव हो सकता है.
कॉस्ट को बढ़ने से रोकने के लिए हर कुएं के लिए फंडिंग की एक सीमा तय की जाएगी. नाम न बताने की शर्त पर एक व्यक्ति ने बताया कि सरकार 3D सिस्मिक सर्वे के लिए भी कुछ हद तक फंडिंग कर सकती है. इस मदद का मकसद खोज से जुड़े जोखिम को कम करना और गहरे पानी में काम करने की विशेषज्ञता और आधुनिक तकनीक वाली ग्लोबल कंपनियों को आकर्षित करना है.
कुआं खोदने में कितना खर्च?ज्यादा कॉस्ट और भारत में खोज के काम में बहुत ज़्यादा सफलता न मिलने की वजह से विदेशी कंपनियां लंबे समय से इससे दूर रही हैं. जमीन की बनावट की जटिलता के आधार पर, गहरे पानी में एक कुआं खोदने में 1,000-1,200 करोड़ रुपए का खर्च आ सकता है. बहुत गहरे पानी (ultra-deepwater) वाले कुएं पर कुछ सौ करोड़ रुपए ज़्यादा खर्च हो सकते हैं. ये इंसेंटिव सरकारी और प्राइवेट, दोनों तरह की खोज करने वाली कंपनियों को मिलेंगे. ONGC ने शनिवार को ‘समुद्र मंथन’ प्रोग्राम के तहत गहरे पानी में खोज वाला अपना पहला कुआँ खोदना शुरू किया.
डीपवॉटर में महारतभारत ‘ओपन एकरेज लाइसेंसिंग प्रोग्राम’ के तहत 18 डीपवॉटर और अल्ट्रा-डीपवॉटर ब्लॉक की नीलामी भी कर रहा है. बोली लगाने की समय सीमा 17 सितंबर तक बढ़ा दी गई है. सरकार को उम्मीद है कि तब तक इंसेंटिव पैकेज को अंतिम रूप दे दिया जाएगा. यह प्रस्ताव मौजूदा खोज व्यवस्था से एक बड़ा बदलाव है, जिसमें ब्लॉक पाने वाली कंपनियों को कम से कम काम का प्रोग्राम (जिसमें सिस्मिक सर्वे और खोज वाले कुएं शामिल हैं) पूरा करना होता है, वरना उन्हें जुर्माना भरना पड़ता है.
कभी-कभी खोज करने वाली कंपनियां ड्रिलिंग न करने का फैसला करती हैं, जब सिस्मिक डेटा से पता चलता है कि कमर्शियल खोज की संभावना कम है. कई कंपनियां ज़्यादा जोखिम वाले कुएं में सैकड़ों करोड़ रुपए लगाने के बजाय ब्लॉक वापस कर देती हैं.
इंसेंटिव स्कीम के साथ-साथ, सरकार खोज करने वाली कंपनियों को उपलब्ध जियोलॉजिकल डेटा की क्वालिटी भी बेहतर बना रही है. उसने ऑफशोर 2D सिस्मिक डेटा हासिल करने में भारी निवेश किया है और अब एडवांस्ड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके पुराने डेटासेट को फिर से प्रोसेस करने के लिए प्राइवेट कंपनियों को लाने पर विचार कर रही है.