Sawan Shivratri 2026: सावन की शिवरात्रि क्यों है इतनी खास? जानिए भोलेनाथ से जुड़ी ये पौराणिक मान्यता
TV9 Bharatvarsh July 28, 2026 11:42 AM

Sawan Shivratri 2026 kab hai​: सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित माना जाता है. इस पूरे महीने में शिव भक्त भोलेनाथ की पूजा, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करते हैं. लेकिन सावन महीने में पड़ने वाली शिवरात्रि का महत्व और भी खास माना गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान शिव की पूजा करने और रात्रि के चारों प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक करने से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं. सावन शिवरात्रि के दिन देशभर के शिव मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है. इस दिन कांवड़िए भी पवित्र नदियों से जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं. मान्यता है कि सावन शिवरात्रि पर सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करने से जीवन के दुख और परेशानियां दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है. आइए जानते हैं सावन कीशिवरात्रि इतनी खास क्यों मानी गई है और इसके पीछे की पौराणिक मान्यता के क्या है.

सावन शिवरात्रि 2026 कब है?

सावन शिवरात्रि सावन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है. द्रिक पंचांग के अनुसार, साल 2026 में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 11 अगस्त को सुबह 4 बजकर 54 मिनट पर शुरू होगी और 12 अगस्त को देर रात 1 बजकर 52 मिनट पर समाप्त होगी. इसलिए उदया तिथि के अनुसार, सावन शिवरात्रि 2026 इस साल 11 अगस्त को मनाई जाएगी.

सावन शिवरात्रि क्यों मानी जाती है खास?

सावन का महीना भगवान शिव को सबसे प्रिय माना जाता है. मान्यता है कि इस महीने में भोलेनाथ की पूजा करने से भक्तों पर उनकी विशेष कृपा होती है. वहीं सावन शिवरात्रि को शिव आराधना के लिए बेहद शुभ माना गया है.कहा जाता है कि इस दिन भगवान शिव को जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और आक के फूल अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं. भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार भोलेनाथ का जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करते हैं. कई लोग इस दिन व्रत रखते हैं और दिनभर भगवान शिव का ध्यान करते हैं. सावन शिवरात्रि पर शिवलिंग पर जल चढ़ाने की भी खास परंपरा है. खासकर कांवड़िए गंगाजल लेकर आते हैं और शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर चढ़ाते हैं. इसे कांवड़ यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.

समुद्र मंथन से जुड़ी है सावन शिवरात्रि की मान्यता

सावन शिवरात्रि से जुड़ी एक प्रमुख पौराणिक मान्यता समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है. धार्मिक कथाओं के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, तब उसमें से कई तरह की चीजें बाहर निकली थीं. इसी दौरान भयंकर विष भी निकला, जिसे हलाहल कहा गया.मान्यता है कि इस विष का असर इतना खतरनाक था कि इससे पूरी सृष्टि पर संकट मंडराने लगा. तब देवताओं और सभी प्राणियों की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया.

विष के प्रभाव से भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और इसी वजह से उन्हें नीलकंठ कहा गया. कहा जाता है कि विष की गर्मी को शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर जल चढ़ाया. इसी मान्यता के कारण सावन के महीने में भगवान शिव का जलाभिषेक करने की परंपरा शुरू हुई मानी जाती है. सावन शिवरात्रि पर भी भक्त भोलेनाथ का जलाभिषेक करके उनसे सुख, शांति और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं.

सावन शिवरात्रि पर चार प्रहर पूजा का महत्व

सावन शिवरात्रि की रात को चार प्रहर में भगवान शिव की पूजा करने की परंपरा है. मान्यता है कि रात के हर प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक और पूजा करने से भक्त को विशेष पुण्य मिलता है. पहले प्रहर में जल से अभिषेक किया जाता है. इसके बाद भक्त अपनी परंपरा और श्रद्धा के अनुसार शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से भी अभिषेक करते हैं. शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाना भी इस पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. मान्यता है कि शिवरात्रि की रात जागरण और पूजा करने से मन को शांति मिलती है और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है.

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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