खाद की कमी नहीं, फिर किसान तक क्यों नहीं पहुंची? उपलब्धता और बिक्री में लाखों टन का अंतर
TV9 Bharatvarsh August 01, 2026 06:42 PM

देश में खाद की उपलब्धता को लेकर सरकार और किसानों के अनुभव के बीच लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं. सरकार का कहना है कि राज्यों की जरूरत के मुताबिक उर्वरकों की सप्लाई सुनिश्चित की जाती है और इसकी मॉनिटरिंग के लिए ऑनलाइन सिस्टम भी मौजूद है. लेकिन लोकसभा में पेश वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि कई प्रमुख उर्वरकों की उपलब्धता और DBT के जरिए दर्ज सेल के बीच लाखों टन का अंतर रहा. हालांकि, सरकार ने इस अंतर की अलग से कोई वजह नहीं बताई है. लोकसभा में रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय की ओर से दिए गए जवाब के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में देश में यूरिया की उपलब्धता 450.79 लाख मीट्रिक टन (LMT) रही, जबकि DBT के जरिए दर्ज सेल 396.60 LMT रही. यानी उपलब्धता और सेल के बीच 54.19 LMT का अंतर दर्ज हुआ. इसी तरह DAP की उपलब्धता 121.72 LMT रही, जबकि सेल 100.80 LMT दर्ज की गई, जिससे 20.92 LMT का अंतर सामने आया. MOP में भी उपलब्धता और सेल के बीच 8.02 LMT का अंतर रहा. यानी कुल अंतर 83 लाख मीट्रिक टन का रहा है.

सरकार ने अपने जवाब में कहा है कि हर फसल सीजन से पहले राज्यों की जरूरत का आकलन किया जाता है, उसी के आधार पर मासिक सप्लाई प्लान बनाई जाती है और iFMS के जरिए उर्वरकों की मूवमेंट की मॉनिटरिंग की जाती है. इसके अलावा रेलवे के साथ कोऑर्डिनेशन और समय पर इम्पोर्ट जैसी व्यवस्थाओं का भी जिक्र किया गया है. हालांकि, उपलब्धता और सेल के बीच दर्ज अंतर की अलग से कोई एक्सप्लेनेशन जवाब में नहीं दी गई है.

किन राज्यों में सबसे ज्यादा अंतर

राज्यवार आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में उपलब्धता और DBT सेल के बीच सबसे बड़ा अंतर उत्तर प्रदेश में दर्ज हुआ. यहां यूरिया की उपलब्धता 91.75 LMT रही, जबकि सेल 80.37 LMT दर्ज की गई. यानी दोनों के बीच 11.38 LMT का अंतर रहा, जो देश में सबसे अधिक है. DAP में भी उत्तर प्रदेश में 25.30 LMT उपलब्धता के मुकाबले 20.25 LMT सेल दर्ज हुई, जिससे करीब 5.05 LMT का अंतर सामने आया. महाराष्ट्र में DAP की उपलब्धता 8.06 LMT रही, जबकि सेल 5.81 LMT दर्ज की गई. यानी 2.25 LMT का अंतर रहा. यूरिया में भी राज्य में उपलब्धता और सेल के बीच 5.10 LMT का अंतर दर्ज हुआ. मध्य प्रदेश, पंजाब और राजस्थान में भी यूरिया की उपलब्धता और सेल के बीच तीन से पांच लाख टन के आसपास का अंतर देखने को मिला. MOP में पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी बड़ा अंतर दर्ज हुआ. ये आंकड़े कई राज्यों में उपलब्धता और सेल के बीच अंतर जरूर दिखाते हैं, लेकिन लोकसभा के जवाब में यह नहीं बताया गया कि यह अंतर सामान्य क्लोजिंग स्टॉक, लॉजिस्टिक्स, अगले सीजन के लिए बचा स्टॉक या किसी अन्य कारण से जुड़ा था.

DAP में इंपोर्ट पर बढ़ती निर्भरता

लोकसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार, DAP के घरेलू प्रोडक्शन में पिछले कुछ वर्षों के दौरान गिरावट दर्ज की गई है. वर्ष 2019-20 में जहां देश में 45.50 LMT DAP का प्रोडक्शन हुआ था, वहीं 2025-26 में यह घटकर 39.01 LMT रह गया. दूसरी ओर, इसी अवधि में DAP का इंपोर्ट 48.70 LMT से बढ़कर 61.94 LMT तक पहुंच गया. इससे साफ होता है कि DAP की मांग पूरी करने में इंपोर्ट की भूमिका पहले की तुलना में बढ़ी है. MOP के मामले में सरकार ने साफ किया है कि इसका घरेलू प्रोडक्शन नहीं होता और इसकी पूरी जरूरत इंपोर्ट के जरिए पूरी की जाती है. वहीं, NPK उर्वरकों का प्रोडक्शन 2019-20 के 93.34 LMT से बढ़कर 2025-26 में 128.37 LMT तक पहुंच गया. इसके बावजूद NPK का इंपोर्ट 7.46 LMT से बढ़कर 37.08 LMT हो गया, जिससे संकेत मिलता है कि बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए इंपोर्ट की जरूरत बनी हुई है.

सरकार ने क्या बताया

सरकार ने लोकसभा में बताया कि राज्यों की मांग का आकलन कृषि एवं किसान कल्याण विभाग करता है, जिसके आधार पर उर्वरक विभाग राज्यों को मासिक आवंटन जारी करता है. सभी प्रमुख सब्सिडी वाले उर्वरकों की मॉनिटरिंग iFMS के जरिए की जाती है. जरूरत पड़ने पर इम्पोर्ट पहले से तय किया जाता है और रेलवे के सहयोग से राज्यों तक रैक उपलब्ध कराए जाते हैं. सरकार ने यह भी साफ किया कि राज्य के भीतर जिला और ब्लॉक स्तर पर उर्वरकों के वितरण की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों की होती है.

लोकसभा में पेश आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2025-26 में कई उर्वरकों की उपलब्धता और DBT सेल के बीच बड़ा अंतर रहा. वहीं सरकार का कहना है कि देश में उर्वरकों की उपलब्धता पर्याप्त रही और सप्लाई सिस्टम की लगातार मॉनिटरिंग की गई. हालांकि, संसद में दिए गए जवाब में उपलब्धता और सेल के बीच दर्ज अंतर के कारणों की अलग से कोई एक्सप्लेनेशन नहीं दी गई है. ऐसे में आंकड़े डिस्ट्रीब्यूशन और सप्लाई चेन से जुड़े सवाल जरूर उठाते हैं, लेकिन केवल इन्हीं आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इसकी वजह सिर्फ डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम या मैनेजमेंट की कमी थी.

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