रिपोर्ट के अनुसार बाहर से आने वाले छात्रों के लिए सबसे बड़ा खर्च रहने की व्यवस्था है. पीजी या किराए के कमरे में पर करीब 1.2 लाख रुपये सालाना खर्च हो जाते हैं. इसके अलावा ट्रांसपोर्ट पर लगभग 18,000 रुपये, खाने पीने और दैनिक जरूरत पर 50 से 60 रुपये, रोजमर्रा के अन्य खर्च पर करीब 24 हजार रुपये, कॉलेज फीस पर लगभग 60 हजार रुपये, किताबें और स्टेशनरी पर करीब 4 हजार रुपये तक खर्च आता है. यानी पढ़ाई की फीस के अलावा रहने और रोजाना की जरूरत का खर्च कुल बजट का बड़ा हिस्सा होता है.
लोकल छात्रों का खर्च काफी कम
वहीं दूसरी ओर जो छात्र अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहते हैं, उनके लिए खर्च का स्वरूप अलग होता है. परिवार के साथ रहने वाले छात्रों को पीजी या किराए का खर्च नहीं उठाना पड़ता. उनका मुख्य खर्च कॉलेज फीस, आने जाने का किराया, किताबें और स्टेशनरी तक सीमित रहता है. एक अनुमान के अनुसार परिवार के साथ रहने वाले छात्र का कुल सालाना खर्च करें 70 हजार रुपये रहता है, जो बाहर से आने वाले छात्रों के मुकाबले बहुत कम है.
हर 100 में 8 लड़कियां बीच में छोड़ रहीं पढ़ाई, डरा देंगे आंकड़े
रहने का खर्च सबसे बड़ा करण
राजधानी दिल्ली में कॉलेज फीस बाहर से आने वाले छात्रों और यहां के लोकल छात्रों के लिए लगभग समान होती है. लेकिन बाहर से आने वाले छात्रों के लिए आवास, भोजन और रोजमर्रा के खर्च कुल बजट को काफी बढ़ा देते हैं. यह वजह है कि दिल्ली में पढ़ाई का वास्तविक खर्च केवल कॉलेज फीस से तय नहीं होता, बल्कि रहने की व्यवस्था और लाइफस्टाइल भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है.
किन चीजों पर सबसे ज्यादा होता है खर्च?
दिल्ली से बाहर के छात्रों के लिए कुल खर्च का बड़ा हिस्सा पीजी या किराए का मकान, खाना और ग्रोसरी, लोकल ट्रांसपोर्ट, बिजली, इंटरनेट और दूसरे रोजाना के खर्चे, कॉलेज फीस, किताबें और स्टेशनरी पर होता है. वहीं परिवार के साथ रहने वाले छात्रों का खर्च मुख्य रूप से कॉलेज की फीस लोकल ट्रांसपोर्ट और किताबों तक सीमित रहता है.
वास्तविक खर्च इससे भी ज्यादा
यह हनुमान केवल नियमित शैक्षणिक और रहने के खर्चे पर आधारित है. इसमें कोचिंग, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, लैपटॉप खरीदना, सिक्योरिटी डिपॉजिट, ट्रांसफर, मेडिकल खर्च, दूसरे एकमुश्त खर्च शामिल नहीं है. ऐसे में कई छात्रों का वास्तविक सालाना बजट इससे भी ज्यादा हो सकता है. इसके अलावा कॉलेज, कोर्स, इलाके, रहने की जगह और हर किसी के खर्च करने के तरीके के आधार पर भी यह खर्च अलग-अलग हो सकता है.