Indore Ajab Gajab News: हिंदू परंपराओं में विवाह को सात जन्मों का पवित्र बंधन माना जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के इंदौर जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जहाँ एक नवविवाहित जोड़े की शादी महज 7 दिन यानी 168 घंटे ही टिक सकी. इंदौर के पारिवारिक न्यायालय ने मामले की संवेदनशीलता और परिस्थितियों को देखते हुए आपसी सहमति से दायर तलाक की अर्जी को तुरंत मंजूरी दे दी और दोनों को विवाह के बंधन से मुक्त कर दिया.
जानकारी के मुताबिक, युवती ने परिवार के दबाव में आकर शादी के लिए सहमति दे दी थी, लेकिन वो इस शादी को करना ही नहीं चाहती थी. विवाह के तुरंत बाद युवती ने अपने पति से स्पष्ट कह दिया कि वो उसके साथ नहीं रह सकती, क्योंकि वो किसी दूसरे युवक से प्यार करती है. पति ने स्थिति की गंभीरता को समझा और दोनों ने एक-दूसरे का जीवन बर्बाद करने के बजाय आपसी सहमति से अलग होने का फैसला किया.
1 साल अलग रहने की कानूनी शर्त और सुप्रीम कोर्ट का हवाला
सामान्यतः हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए पति-पत्नी का कम से कम 1 वर्ष तक अलग रहना अनिवार्य होता है. जोड़े की तरफ से पैरवी कर रहीं वरिष्ठ अधिवक्ता वर्षा गुप्ता ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 14(2) का सहारा लिया. एडवोकेट वर्षा गुप्ता ने अदालत में तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि जो विवाह वास्तविकता में अस्तित्व में ही नहीं आया हो, उसमें दोनों पक्षों को साथ रहने के लिए मजबूर करना उनके समय और भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा.
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पारिवारिक न्यायालय ने सुनाया त्वरित फैसला
दौर फैमिली कोर्ट ने मामले के तथ्यों, परिस्थितियों और दोनों पक्षों की स्पष्ट सहमति को ध्यान में रखते हुए 1 साल की अनिवार्य अवधि की शर्त से छूट दी. अदालत ने महज सात दिनों (168 घंटों) के रिकॉर्ड समय में विवाह को शून्य/विच्छेदित घोषित करते हुए तलाक की याचिका को तत्काल मंजूरी दे दी.