Xप्लेन: लाखों लोगों पर खतरा, समुद्र का बढ़ता जलस्तर मुंबई-कोलकाता के लिए बना अस्तित्व का संकट!
संकल्प ठाकुर September 07, 2026 07:42 PM

संयुक्त राष्ट्र की एक हालिया रिपोर्ट में ग्लोबल क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) के बढ़ते प्रभावों को लेकर एक बेहद गंभीर चेतावनी जारी की गई है. इस रिपोर्ट में भारत के दो सबसे प्रमुख तटीय महानगरों मुंबई और कोलकाता को पर्यावरण से जुड़े अस्तित्व के अभूतपूर्व संकट के मुहाने पर खड़ा बताया गया है. समुद्र के जलस्तर में लगातार हो रही बढ़ोतरी पर जारी संयुक्त राष्ट्र महासचिव के विस्तृत आकलन के अनुसार, दक्षिण एशिया के निचले इलाकों में बसे प्रमुख शहरों के 1.4 करोड़ से अधिक लोग समुद्र का पानी भरने की वजह से हमेशा के लिए विस्थापित होने के तात्कालिक और बढ़ते खतरे का सामना कर रहे हैं.

यह रिपोर्ट 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) के तटीय मेगा-सिटीज के लिए एक कड़वी और चिंताजनक सच्चाई को उजागर करती है. इन शहरों में घनी आबादी, तीव्र आर्थिक गतिविधियां और तेज़ी से होता शहरीकरण सीधे तौर पर गर्म होती धरती और समुद्र की बढ़ती सीमाओं से टकरा रहे हैं. भारत के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक केंद्रों में शामिल मुंबई और कोलकाता के लिए यह संकट बुनियादी ढाँचे, आवास व्यवस्था, जनस्वास्थ्य और सामाजिक स्थिरता के लिए एक दूरगामी चुनौती पेश करता है.

जलस्तर में बढ़ोतरी का विज्ञान और जमीनी वास्तविकता

समुद्र के जलस्तर में वृद्धि मुख्य रूप से ग्लोबल वार्मिंग से जुड़ी दो प्रमुख थर्मल प्रक्रियाओं का परिणाम है.

  1. थर्मल विस्तार (Thermal Expansion): तापमान बढ़ने के कारण समुद्री जल का फैलना.

  2. ग्लेशियरों का पिघलना: ज़मीन पर मौजूद बर्फ की विशाल चादरों और ग्लेशियरों का तेज़ गति से पिघलकर महासागरों में मिलना.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट रेखांकित करती है कि पिछले तीन दशकों में वैश्विक स्तर पर समुद्र के जलस्तर में वृद्धि की गति उम्मीद से काफी तेज़ हुई है, जो शुरुआती जलवायु मॉडलिंग के अनुमानों से कहीं अधिक गंभीर है.

नदी के निचले डेल्टा और तटीय मैदानों के लिए यह स्थिति अधिक विनाशकारी रूप ले लेती है. निचले गंगा डेल्टा में हुगली नदी के किनारे बसा कोलकाता, एक साथ तीन-तरफा मार झेल रहा है समुद्र का बढ़ता जलस्तर, नदियों में आने वाली भीषण मानसूनी बाढ़ और ज़मीन का प्राकृतिक रूप से धंसना.

दूसरी ओर, मुंबई जो अरब सागर के किनारे मुख्य रूप से समुद्र से हासिल की गई ज़मीन पर निर्मित एक द्वीप समूह है, तेज़ तूफ़ानी लहरों, मानसूनी अतिवृष्टि और अत्यधिक ऊंचे ज्वार की घटनाओं का सामना करता है. ये ऊंची लहरें अक्सर मौजूदा तटीय सुरक्षा घेरों को ध्वस्त कर देती हैं.  जलस्तर बढ़ने से रोज़ाना आने वाला ऊंचा ज्वार ज़मीन के अंदर तक प्रवेश कर रहा है, जिससे भूमिगत मीठे पानी के स्रोत खारे पानी से दूषित हो रहे हैं और रिहायशी इलाके स्थायी रूप से जलमग्न होने की कगार पर हैं.

मुंबई: तटीय दबाव तले दबती देश की आर्थिक राजधानी

भारत की आर्थिक रीढ़ के रूप में मुंबई देश की GDP का एक बड़ा हिस्सा उत्पन्न करता है. यहां प्रमुख वित्तीय संस्थान, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, प्रमुख कॉर्पोरेट मुख्यालय और देश के सबसे व्यस्त बंदरगाह स्थित हैं. हालांकि, शहर का एक विशाल हिस्सा समुद्र के औसत जलस्तर से बेहद कम ऊंचाई पर बसा है.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि तटीय इलाकों के स्थायी या आंशिक जलमग्न होने से केवल समुद्र तट के किनारे अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लाखों निर्धन नागरिक ही बेघर नहीं होंगे, बल्कि शहर का मुख्य परिवहन नेटवर्क, बिजली ग्रिड और कमर्शियल रियल एस्टेट भी गंभीर रूप से ठप हो जाएंगे. प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को तटीय बाढ़ से होने वाले नुकसान से पूरे मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन (PMMR) की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता पर खतरा मंडरा रहा है.

कोलकाता: संवेदनशील डेल्टा और मानवीय विस्थापन का जोखिम

कोलकाता की स्थिति भी उतनी ही संवेदनशील है. विश्व के सबसे विशाल और नाजुक सुंदरबन डेल्टा पारिस्थितिक तंत्र के मुहाने पर बसा यह शहर पूरे पूर्वी भारत का आर्थिक व सांस्कृतिक केंद्र है. आसपास के सुंदरबन क्षेत्र में तटीय कटाव और मैंग्रोव के नुकसान के कारण लोग पहले से ही विस्थापित होकर कोलकाता के निचले उपनगरों में शरण ले रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र के निष्कर्षों के अनुसार, समुद्र का बढ़ता पानी कोलकाता की जल निकासी और स्वच्छता प्रणाली को पूरी तरह ध्वस्त कर सकता है. इससे दूषित जल से फैलने वाली बीमारियों और वेक्टर-जनित (कीड़ों से फैलने वाली) महामारी का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा. इसके अलावा, बंगाल की खाड़ी में बार-बार आने वाले तीव्र चक्रवाती तूफानों के दौरान घनी आबादी वाले निचले इलाकों में अचानक बड़े पैमाने पर विस्थापन का मानवीय संकट उत्पन्न हो सकता है.

इसका समाधान क्या

इस आसन्न संकट से निपटने के लिए स्थानीय निकायों, राज्य सरकारों, केंद्र सरकार और अंतरराष्ट्रीय जलवायु कोष के बीच एक एकीकृत और दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है. वर्तमान में निम्नलिखित प्रमुख अनुकूलन उपायों पर बल दिया जा रहा है

  • ग्रे और ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर का मेल: समुद्र की प्रचंड लहरों को रोकने के लिए मज़बूत सी-वॉल और स्टॉर्मवॉटर ड्रेनेज के निर्माण के साथ-साथ मैंग्रोव जंगलों व वेटलैंड्स जैसे प्राकृतिक तटीय बफ़र्स का पुनरुद्धार करना.

  • लचीली शहरी योजना व निर्माण नियम: तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) के नियमों को सख्ती से लागू करना, जोखिम वाले बाढ़-मैदानों में अनियंत्रित निर्माण पर रोक लगाना और नए बिल्डिंग कोड तैयार करना.

  • व्यवस्थित पुनर्वास (Managed Retreat): अति-संवेदनशील तटीय क्षेत्रों में रहने वाली आबादी के लिए न्यायपूर्ण, सुरक्षित और पूर्व-नियोजित पुनर्वास नीति बनाना.

  • एकीकृत जल प्रबंधन: भूजल के खारेपन से बचाव के लिए वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) और उन्नत डिसेलिनेशन (Desalination) तकनीकों को बढ़ावा देना.

मुंबई और कोलकाता के सामने खड़ा यह संकट केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण दक्षिण एशिया के तटीय क्षेत्रों की साझा चुनौती है. समय रहते यदि वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती नहीं की गई और स्थानीय स्तर पर अनुकूलन के कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में यह पर्यावरणीय बदलाव करोड़ों लोगों को बेघर कर एक नया वैश्विक 'जलवायु शरणार्थी' संकट पैदा कर सकता है.

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