गणेश चतुर्थी पर सुबह 11 बजे नहीं कर पाए गणपति स्थापना तो इन 5 शुभ मुहूर्त में घर ला सकते हैं बप्पा
जागृति सोनी बरसले September 10, 2026 11:42 AM

Ganesh Chaturthi 2026: हिंदू धर्म में भगवान गणेश जी को सर्वप्रथम पूजनीय माना गया है. गणेश चतुर्थी सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे तक स्थापना का सबसे शुभ मुहूर्त है लेकिन जो लोग इस मुहूर्त में बप्पा की स्थापना न कर पाएं वो चौघड़िया के शुभ मुहूर्त देखकर गणपति स्थापना कर सकते हैं. यहां देखें 14 सितंबर को गणेश स्थापना के कौन-कौन से मुहूर्त बन रहे है.

पंचांग की गणना के अनुसार, चतुर्थी तिथि का आरंभ 14 सितंबर को सुबह में 7 बजकर 6 मिनट पर आरंभ होगी और 15 सितंबर को सुबह में 7 बजकर 45 मिनट पर खत्म होगी.

गणेश स्थापना के 3 शुभ मुहूर्त

तारीख - 14 सितंबर 2026

चर - दोपहर 1.49 - दोपहर 3.22

लाभ - दोपहर 3.22 - शाम 4.55

अमृत - शाम 4.55 - शाम 6.28

गणेश स्थापना के लिए दोपहर का समय ही क्यों?

मान्यता है कि भगवान गणेश का प्राकट्य भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के मध्याह्न काल में हुआ था. इसी कारण गणेश चतुर्थी पर बप्पा की स्थापना और पूजा के लिए दोपहर का मध्याह्न काल सबसे शुभ माना जाता है. पंचांग में इसी आधार पर गणेश पूजा का विशेष मुहूर्त निर्धारित किया जाता है. माना जाता है कि इस समय विधि-विधान से गणपति की पूजा करने से विघ्नों का नाश और शुभ कार्यों में सफलता का आशीर्वाद मिलता है.

कलश मूर्ति के दाईं या बाईं ओर रखें

अगर आप पूजा करने वाले व्यक्ति की दृष्टि से देखें, तो कलश गणेश जी के बाईं ओर रखा जाता हैयानी गणपति की प्रतिमा सामने हो और आप पूजा के लिए बैठे हों, तो कलश आपके दाईं ओर आएगा.

कलश को चौकी पर गणेश जी के पास रखें और उसमें जल, अक्षत, सुपारी आदि रखकर ऊपर आम या अशोक के पत्ते और नारियल स्थापित कर सकते हैं.

गणेश मूर्ति के नियम

  • मिट्टी की मूर्ति को प्राथमिकता दें. प्लास्टर ऑफ पेरिस या केमिकल से बनी प्रतिमा के बजाय प्राकृतिक मिट्टी की मूर्ति बेहतर मानी जाती है.
  • सफेद मदार की जड़, सोने, चांदी या तांबे से बनी गणेश प्रतिमा की भी पूजा की जा सकती है.
  • घर में गणेश जी की बैठी हुई प्रतिमा स्थापित करना शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इससे घर में स्थिरता और सुख-समृद्धि बनी रहती है.
  • गृहस्थों के लिए बाईं ओर मुड़ी सूंड वाले गणेश जी की प्रतिमा को सामान्यतः शुभ और पूजा के लिए सरल माना जाता है.
  • गणेश जी की प्रतिमा में कंधे पर नाग रूपी जनेऊ होना उनके पारंपरिक स्वरूप का हिस्सा माना जाता है.
  • प्रतिमा में गणेश जी का मूषक वाहन भी होना चाहिए. मूषक गणपति के पारंपरिक स्वरूप का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
  • शास्त्रीय वर्णनों में गणेश जी के धूम्रवर्ण स्वरूप का उल्लेख मिलता है. हालांकि अलग-अलग परंपराओं में विभिन्न रंगों की प्रतिमाएं भी स्थापित की जाती हैं.
  • गणेश जी को भालचंद्र कहा जाता है, इसलिए ललाट पर चंद्रमा वाला स्वरूप उनके प्रसिद्ध रूप का प्रतीक माना जाता है.
  • गणेश जी की प्रतिमा में पाश और अंकुश दोनों का होना उनके पारंपरिक स्वरूप और आयुधों का प्रतीक माना जाता है.

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