UGC के नए नियमों पर 'सुप्रीम' रोक, खत्म होगा विरोध या और भड़केगा?
अविनाश राय January 29, 2026 08:12 PM

छात्रों के साथ जाति के आधार पर हो रहे भेदभाव को रोकने के लिए यूजीसी के बनाए नए कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली दो जजों की बेंच ने इस नए नियम पर अगले आदेश तक रोक लगाते हुए कहा है कि यूजीसी को साल 2012 के बनाए कानून पर ही चलना होगा, लेकिन असल सवाल ये है कि अब आगे क्या होगा. क्या जो छात्र, छात्रों के संगठन और सामान्य श्रेणी से आने वाले नेता बड़े पैमाने पर इस कानून का विरोध कर रहे थे, उनका प्रदर्शन थम जाएगा या फिर जो छात्र संगठन और एससी-एसटी-ओबीसी समुदाय से आने वाले नेता इस कानून का समर्थन कर रहे थे, वो इस कानून पर रोक लगने की वजह से नाराज होकर विरोध प्रदर्शन करने लगेंगे. और इससे भी बड़ा सवाल कि अब सरकार क्या करेगी, जिसको एक तरफ कुंआ और दूसरी तरफ खाई नजर आने लगी है. आखिर यूजीसी के नए नियमों पर लगी सुप्रीम रोक से देश की राजनीति में अब कौन सा बड़ा बदलाव आएगा, आज क्लियर कट बात होगी इसी मुद्दे पर. 

13 जनवरी 2026 वो तारीख थी, जब यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन यानी कि यूजीसी की ओर से एक गजट जारी किया गया. गजट का नाम था Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026. इसका मकसद था देश के हर शिक्षण संस्थान में भेदभाव के खिलाफ एक मजबूत और एक जैसा कानून लागू करना. लेकिन इस कानून के कुछ प्रावधानों और कानून की भाषा से न सिर्फ छात्रों का बल्कि सामान्य श्रेणी के आने वाले नेताओं को भी गंभीर आपत्ति थी और उनका मानना था कि इस नए कानून की वजह से सामान्य श्रेणी के छात्रों को हमेशा के लिए दोषी मान लिया जाएगा. इसको लेकर पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए. सबसे बड़ा विरोध उत्तर प्रदेश में देखने को मिला, जहां काशी हिंदू विश्वविद्यालय से लेकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और लखनऊ यूनिवर्सिटी में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए.

इन प्रदर्शनों पर सत्ता पक्ष और खास तौर से केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की ओर से कहा गया कि किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा. तो विपक्ष की ओर से अखिलेश यादव का बेहद नपा-तुला जवाब मिला. वहीं मायावती ने इस नए कानून का खुला समर्थन किया. तो दक्षिण भारत के चुनावी राज्य तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भी इस नए कानून का खुले दिल से स्वागत किया था.

इस राजनीतिक बयानबाजी के बीच प्रदर्शन चलते रहे और कई जगहों पर पूरा गुस्सा बीजेपी और केंद्र सरकार के खिलाफ भी फूटा, जिसमें कई बीजेपी नेताओं ने अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया था. लेकिन 29 जनवरी की दोपहर इन सभी प्रदर्शनकारियों के लिए राहत की खबर लेकर आई, क्योंकि इस केस की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस नए नियम पर रोक लगा दी और कहा कि अगले आदेश तक 2012 वाले नियम ही यूनिवर्सिटी में लागू रहेंगे.

अब 2012 वाले नियम क्या हैं, उसको भी जरा संक्षेप में समझ लेते हैं और तब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के असर की बात करते हैं. तो 2012 की व्यवस्था ये थी कि छात्रों के लिए यूनिवर्सिटी में सिस्टम बंटा हुआ था.

  • SC/ST छात्रों के लिए अलग एंटी-डिस्क्रिमिनेशन सेल होती थी.
  • महिलाओं के लिए अलग शिकायत तंत्र होता था.
  • दिव्यांगों के लिए अलग नियम-कानून थे, जो उनके साथ किसी भी तरह के भेदभाव को रोकते थे.

लेकिन पूरे कैंपस के लिए एक ऐसा कॉमन, सख्त और समय-सीमा में फैसला देने वाला सिस्टम नहीं था. इससे होता ये था कि कई शिकायतें दब जाती थीं या सालों तक लटकी रहती थीं. ऐसे में Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 के जरिए यूजीसी ने हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में दो व्यवस्थाएं अनिवार्य कर दीं.

1. Equal Opportunity Centre (EOC), जहां कोई भी छात्र या शिक्षक यह कह सकेगा कि उसके साथ भेदभाव हुआ है, चाहे जिस भी वजह से.

2. Equity Committee, जो इन शिकायतों की जांच करेगी और कार्रवाई की सिफारिश करेगी.

नए कानून के तहत कमेटी में कुलपति या प्रिंसिपल, SC प्रतिनिधि, ST प्रतिनिधि, OBC प्रतिनिधि, महिला सदस्य, अल्पसंख्यक या दिव्यांग प्रतिनिधि और एक सीनियर प्रोफेसर या विशेषज्ञ को होना था और फैसला किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि सामूहिक समिति का होना था. कमेटी का काम था शिकायत दर्ज करना, दोनों पक्षों को सुनना, सबूत और रिकॉर्ड देखना, समय पर रिपोर्ट बनाना और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की सिफारिश करना. लेकिन असली विवाद यहीं से शुरू हो गया, क्योंकि इस समिति में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था कि सामान्य श्रेणी से आने वाला कोई छात्र या शिक्षक इस कमेटी का सदस्य हो सके. लिहाजा सामान्य श्रेणी के छात्रों ने नए कानून के विरोध में आंदोलन शुरू किया जो सड़क और यूनिवर्सिटी कैंपस से निकलकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया. और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने इस नए कानून पर रोक लगा दी.

फैसला आते ही जो छात्र विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, वो अबीर-गुलाल उड़ाकर जश्न मनाने लगे और सुप्रीम कोर्ट को थैंक्यू बोलने लगे.  लेकिन अब सवाल उस वर्ग को लेकर है, जिनके लिए ये नियम बनाया गया था. नियम खास तौर पर एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के साथ भेदभाव न हो, इसके लिए बना था. लेकिन अब कानून पर रोक लग गई है तो ये छात्र अब क्या करेंगे. क्या ये छात्र सुप्रीम कोर्ट के अगले आदेश का इंतजार करेंगे या फिर आंदोलन की बारी अब इनकी है, ये भी सवाल अब सरकार के सामने मुंह बाए खड़ा है. क्योंकि अभी तो सामान्य श्रेणी के छात्र ही आंदोलन कर रहे थे दायरा इतना बड़ा हो गया था, अगर एससी,एसटी और ओबीसी वर्ग के छात्र आंदोलन पर उतरे तो उसका असर कितना व्यापक हो सकता है, आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है.

बाकी होने को तो ये भी हो सकता है कि अगली सुनवाई यानी कि 19 मार्च को वो एक्सपर्ट कमिटी बन जाए, जिसकी बात चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने अपने फैसले में की है. लेकिन उसमें अभी वक्त है. और इस मुद्दे पर जैसी सियासी बयानबाजी अभी शुरू हो गई है, उसमें इस मुद्दे को हवा मिलनी तय है. और इसमें सबसे ज्यादा मुश्किल केंद्र सरकार की है. क्योंकि इस साल बंगाल से लेकर तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और असम तक में विधानसभा के चुनाव हैं. और हो सकता है कि इन चुनावों में यूजीसी के नियमों का असर थोड़ा कम हो, लेकिन जैसा आंदोलन उत्तर प्रदेश में देखने को मिला है, उसे मद्देनजर रखते हुए केंद्र की बीजेपी सरकार को बीच का रास्ता अपनाना पड़ सकता है क्योंकि 2027 में उत्तर प्रदेश में भी विधानसभा के चुनाव हैं. और यूपी में जातीय समीकरण किसी भी चुनाव को किस कदर प्रभावित करते हैं, ये किसी से छिपा नहीं है. यूजीसी के नए नियमों के विरोध में इस्तीफा देने वाले बीजेपी नेता भी सबसे ज्यादा यूपी से ही हैं और अगर ये नया कानून सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कहीं ठंडे बस्ते में चला गया तो फिर बीजेपी के एससी,एसटी और ओबीसी नेता भी अपना इस्तीफा लेकर बैठे हुए नजर आ सकते हैं.  

यानी कि बीजेपी के बड़े-बड़े नेताओं के सामने एक तरफ कुआँ है और दूसरी तरफ खाई. अगर यूजीसी के नए नियमों का समर्थन किया तो सामान्य जाति के लोग नाराज, अगर विरोध किया तो एससी,एसटी, ओबीसी नाराज और अगर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर पल्ला झाड़ने की कोशिश भी सरकार की तरफ से हुई तो मैसेज तो जाएगा ही कि सरकार इस कानून में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही है. क्योंकि सरकार चाहे तो संसद के जरिए कानून बनाकर भी मसले को हल कर सकती है और ये बात हर पढ़ने वाले छात्र और राजनीति में सक्रिय हर छोटे-बड़े नेता को बखूबी मालूम है.

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