केंद्रीय बजट में इस बार चाबहार बंदरगाह परियोजना के लिए कोई धनराशि आवंटित नहीं की गई. अमेरिका की ओर से ईरान पर नए प्रतिबंध लगाये जाने की पृष्ठभूमि में यह कदम उठाया गया है. भारत पिछले कुछ सालों से ईरान के दक्षिणी तट पर स्थित सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में जारी विशाल कनेक्टिविटी परियोजना पर हर साल 100 करोड़ रुपये खर्च कर रहा है. चाबहार बंदरगाह के विकास में भारत एक प्रमुख साझेदार है.
अमेरिका ने ईरान पर लगाए कड़े प्रतिबंध
अमेरिका ने सितंबर 2025 में ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन चाबहार बंदरगाह परियोजना पर लागू प्रतिबंधों से भारत को छह महीने की छूट दी थी. यह छूट 26 अप्रैल 2026 को खत्म होने जा रही है. विदेश मंत्रालय ने पिछले महीने कहा था कि भारत चाबहार बंदरगाह परियोजना से संबंधित मुद्दे पर अमेरिका के साथ बातचीत कर रहा है. न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर ट्रंप प्रशासन की ओर से 25 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने की धमकी के बाद भारत इस प्रोजेक्ट से संबंधित अलग-अलग विकल्पों पर विचार कर रहा है.
क्या है चाबहार पोर्ट को डेवलप करने का उद्देश्य?
भारत और ईरान मिलकर चाबहार पोर्ट का विकास कर रहा है ताकि कनेक्टिविटी और व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा मिल सके. दोनों देश चाबहार बंदरगाह को इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का अभिन्न अंग बनाने के लिए भी पुरजोर कोशिश कर रहे हैं. INSTC भारत, ईरान, अफगानिस्तान, आर्मेनिया, अजरबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप के बीच माल ढुलाई के लिए 7,200 किलोमीटर लंबी परिवहन परियोजना है.
चाबहार पोर्ट के संचालन के लिए हुआ 10 साल का करार
भारत ने मई 2024 को ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट स्थित चाबहार बंदरगाह पर शाहिद बेहिश्ती टर्मिनल के विकास और संचालन के लिए ईरान के साथ 10 साल के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे. समझौते के तहत, सरकारी स्वामित्व वाली आईपीजीएल लगभग 120 मिलियन डॉलर का निवेश करेगी, जबकि फाइनेंसिंग में अतिरिक्त 250 मिलियन डॉलर खर्च करने पर सहमति बनी थी.
भारत ने फिलहाल आधिकारिक तौर पर चाबहार परियोजना से हाथ नहीं खींचा है, लेकिन फंडिंग में यह रुकावट अमेरिका की ओर से भारत पर लगाए गए भारी टैरिफ के बीच आई है. अमेरिकी राष्ट्रपति चाहते हैं कि भारत ईरान के साथ भी अपना व्यापार कम करे. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी नियमों का उल्लंघन करने से बचने के लिए भारत स्थानीय ईरानी कर्मचारियों के जरिए इस परियोजना का प्रबंधन कर रहा है.