ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन ने माघ पूर्णिमा और संत शिरोमणि गुरु रविदास जी की जयंती पर देशवासियों, श्रद्धालुओं और कल्पवासियों को शुभकामनाएँ दी हैं। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने इस अवसर पर कहा कि माघ मास तप, साधना, दान और स्नान का पवित्र महीना है, और माघ पूर्णिमा इसका परम मंगलमय समापन पर्व है।
स्वामी चिदानन्द के अनुसार, माघ पूर्णिमा केवल बाहरी अनुष्ठानों का पर्व नहीं है, बल्कि आत्मशुद्धि और अंतर्मन के जागरण का अवसर भी है। इस दिन पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा, यमुना और संगम में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है और मन, वचन और कर्म की शुद्धि प्राप्त होती है। इस दिन दान, हवन, सत्संग, कथा-श्रवण और भजन-कीर्तन के माध्यम से ईश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
स्वामी चिदानन्द ने बताया कि माघ पूर्णिमा हमें संयम, सेवा, करुणा और परोपकार की भावना से जीवन जीने की प्रेरणा देती है। सनातन परंपरा में ‘दान’ और ‘स्नान’ के साथ ‘ज्ञान’ का विशेष महत्व है, जो आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है।
साथ ही आज संत शिरोमणि गुरु रविदास जी की जयंती भी है। परमार्थ निकेतन ने उनके जीवन और राष्ट्र साधना को नमन किया। गुरु रविदास जी ने अपने जीवन और वाणी से समाज में आध्यात्मिक चेतना के साथ-साथ सामाजिक जागरण का मार्ग दिखाया। उन्होंने भक्ति आंदोलन को नई दिशा दी और ईश्वर-प्रेम को जाति, वर्ग और भेदभाव से ऊपर रखा। उनकी रचनाएँ सरल भाषा में मानवता, करुणा और समरसता का संदेश देती हैं।
गुरु रविदास जी का प्रसिद्ध संदेश “मन चंगा तो कठौती में गंगा” बताता है कि भक्ति बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि निर्मल मन और शुद्ध आचरण में निहित है। उनके विचार आज भी सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं। गुरु रविदास जी का जीवन प्रेरित करता है कि हम प्रेम, समानता और सेवा के मूल्यों को अपनाकर एक न्यायपूर्ण और समावेशी समाज का निर्माण करें।
इस पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन ने सभी से अपील की कि वे अपने जीवन में पवित्रता, सदाचार और धर्म के आदर्शों को अपनाएँ और राष्ट्र तथा समाज के कल्याण के लिए समर्पित हों। माघ पूर्णिमा और संत रविदास जयंती के इस शुभ अवसर पर सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की मंगलकामनाएँ।