News India Live, Digital Desk : अगर आप भी अपनी पीएचडी थिसिस (PhD Thesis) लिखने के लिए चैटजीपीटी (ChatGPT) या अन्य एआई टूल्स का सहारा ले रहे हैं, तो सावधान हो जाइए। यूजीसी ने स्पष्ट कर दिया है कि एआई से 'कॉपी-पेस्ट' किया गया शोध मान्य नहीं होगा। इसी कड़ी में बिहार के बीआरए बिहार विश्वविद्यालय (BRABU) में एक बड़ी कार्रवाई देखने को मिली है, जहाँ एआई का इस्तेमाल कर तैयार की गई कई छात्रों की थिसिस को सिरे से खारिज कर दिया गया है।सॉफ्टवेयर ने पकड़ ली चोरी: AI डिटेक्टर का कमालविश्वविद्यालय प्रशासन ने शोध की मौलिकता जांचने के लिए अत्याधुनिक प्लेजरिज्म (Plagiarism) सॉफ्टवेयर और AI डिटेक्टर का इस्तेमाल किया। जांच में पाया गया कि कई छात्रों ने अपने रिसर्च वर्क में 50% से ज्यादा हिस्सा एआई द्वारा जनरेट किया था। यूजीसी के नियमों के अनुसार, शोध में मौलिकता अनिवार्य है और किसी भी मशीन द्वारा तैयार किया गया कंटेंट 'बौद्धिक चोरी' की श्रेणी में आता है।UGC के नए दिशा-निर्देश: शोधार्थियों को सख्त चेतावनीयूजीसी ने सभी विश्वविद्यालयों को निर्देशित किया है कि वे शोध की गुणवत्ता से किसी भी कीमत पर समझौता न करें।जीरो टॉलरेंस पॉलिसी: एआई के अनैतिक उपयोग पर 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई जा रही है।डिग्री पर संकट: यदि किसी छात्र की थिसिस में एआई का उपयोग पाया जाता है, तो न केवल उसकी थिसिस रिजेक्ट होगी, बल्कि उस पर दंडात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है।गाइड्स की जिम्मेदारी: अब शोध के गाइड (Supervisors) को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके छात्र मौलिक कार्य कर रहे हैं।क्यों खतरनाक है रिसर्च में AI का इस्तेमाल?विशेषज्ञों का मानना है कि एआई टूल्स अक्सर गलत तथ्य (Hallucinations) पेश करते हैं और उनमें वह गहराई नहीं होती जो एक मानव शोधार्थी के वर्षों के अध्ययन से आती है। पीएचडी का अर्थ ही 'नया ज्ञान खोजना' है, जबकि एआई केवल पुराने डेटा को रीसाइकिल करता है।BRABU प्रशासन का कड़ा रुखबीआरएबीयू के कुलपति और शोध विभाग ने साफ कर दिया है कि जिन छात्रों की थिसिस रिजेक्ट हुई है, उन्हें अब सिरे से काम करना होगा। यदि दोबारा ऐसी गलती पाई गई, तो उन्हें रिसर्च प्रोग्राम से बाहर भी किया जा सकता है। इस कार्रवाई से पूरे विश्वविद्यालय परिसर में हड़कंप मचा हुआ है।