मुंबई, 10 फरवरी। यह कहानी 1950 के दशक के अंत की है। आगरा के एक युवा ने मुंबई के फिल्मिस्तान स्टूडियो के बाहर खड़े होकर अपने सपनों को देखने की कोशिश की। उसके पास कुछ पैसे थे और एक सपना था, लेकिन वह सपना डॉक्टर बनने का था। लेकिन किस्मत ने उसे कुछ और ही रास्ता दिखाया। प्री-मेडिकल टेस्ट में असफलता ने उसे चिकित्सा क्षेत्र से दूर कर दिया, लेकिन कला की दुनिया में कदम रखने का मौका दिया। यह कहानी है भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध 'सज्जन निर्देशक' रवि टंडन की।
रवि टंडन का जन्म 17 फरवरी 1935 को आगरा के एक प्रतिष्ठित पंजाबी परिवार में हुआ। जब वह मुंबई आए, तो उन्होंने एक जूनियर आर्टिस्ट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। केवल सौ रुपए महीने की तनख्वाह पर उन्होंने छोटे-मोटे किरदार निभाए। 'लव इन शिमला' (1960) के सेट पर उन्होंने अभिनय की बारीकियों को समझा और यह भी जाना कि असली जादू कैमरे के पीछे होता है।
आरके नय्यर के सहायक के रूप में काम करते हुए उन्होंने अनुशासन सीखा। उनकी मेहनत का फल यह हुआ कि दिग्गज अभिनेता मनोज कुमार ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें फिल्म 'बलिदान' (1971) से स्वतंत्र निर्देशन का अवसर मिला।
रवि टंडन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी एक शैली में सीमित नहीं रहे। 1970 के दशक में जहां एक्शन फिल्मों का बोलबाला था, वहीं टंडन ने मनोवैज्ञानिक रहस्यों और म्यूजिकल थ्रिलर्स का नया संसार रचा।
संजीव कुमार के साथ बनाई गई फिल्म 'अनहोनी' (1973) आज भी एक कल्ट क्लासिक मानी जाती है। इसमें एक मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ति की कहानी को जिस संवेदनशीलता और रहस्य के साथ उन्होंने प्रस्तुत किया, उसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
अमिताभ बच्चन के 'एंग्री यंग मैन' के दौर में, टंडन ने उन्हें एक दृढ़निश्चयी 'विजय' के रूप में पेश किया। फिल्म 'मजबूर' (1974) की गति और इसका क्लाइमेक्स आज के थ्रिलर्स को भी मात देता है।
क्या कोई सोच सकता था कि कॉलेज की मस्ती, आरडी बर्मन का संगीत और एक खौफनाक कत्ल की गुत्थी एक साथ मिल सकते हैं? रवि टंडन ने 'म्यूजिकल मिस्ट्री' की इस विधा को फिल्म 'खेल खेल में' (1975) से जन्म दिया, जिसने ऋषि कपूर-नीतू सिंह की जोड़ी को अमर बना दिया।
फिल्म उद्योग में 'नेपोटिज्म' पर बहस आज होती है, लेकिन रवि टंडन ने दशकों पहले एक मिसाल पेश की। उनकी बेटी रवीना टंडन को उन्होंने खुद लॉन्च नहीं किया, जिससे रवीना ने अपनी मेहनत से 'पत्थर के फूल' हासिल किया।
टंडन की निर्देशन शैली को 'क्रिस्प' कहा जाता था। वे पटकथा की गति पर ध्यान देते थे। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आरडी बर्मन के साथ उनके तालमेल ने हमें ऐसे गीत दिए जो आज भी शादियों और पार्टियों की जान हैं।
11 फरवरी 2022 को रवि टंडन ने अंतिम सांस ली। जुहू में उनके सम्मान में एक चौक का नाम 'रवि टंडन चौक' रखा गया है। 2020 में उन्हें ब्रज रत्न अवॉर्ड मिला।