मुंबई, 12 फरवरी। फिल्म निर्देशक शेखर कपूर ने भारतीय टेलीविजन के सुनहरे दिनों को याद करते हुए, मूल्य आधारित और समाज को दिशा देने वाली कहानियों की कमी पर चिंता व्यक्त की।
उन्होंने प्रसिद्ध टीवी धारावाहिक 'उड़ान' का जिक्र करते हुए कहा, "यह केवल एक शो नहीं था, बल्कि एक ऐसा प्लेटफॉर्म था जिसने पूरे देश की सोच को प्रभावित किया। आज के भारत को फिर से ऐसे कंटेंट की आवश्यकता है, जो न केवल मनोरंजन करे, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव भी लाए।"
शेखर कपूर ने सोशल मीडिया पर 'उड़ान' से जुड़ी एक पुरानी तस्वीर साझा की और बताया, "यह धारावाहिक उस समय आया जब देश में केवल एक ही टीवी चैनल था, 'दूरदर्शन'। इसका अंतिम एपिसोड 1991 में प्रसारित हुआ, लेकिन इसकी यादें आज भी ताजा हैं। उस समय 'उड़ान' एक जुनून बन चुका था और इसकी लोकप्रियता किसी बड़े आंदोलन से कम नहीं थी।"
उन्होंने आगे कहा, "'उड़ान' के प्रसारण के दौरान शो के कलाकारों की पहचान इतनी मजबूत थी कि लोग उन्हें उनके किरदारों के नाम से जानते थे। छोटे शहरों और गांवों में लोग मुझे 'कलेक्टर साहब' कहकर बुलाते थे, क्योंकि मैंने इस सीरियल में कलेक्टर की भूमिका निभाई थी।"
शेखर कपूर ने कहा, "'उड़ान' का प्रभाव केवल इसकी लोकप्रियता तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका सामाजिक प्रभाव भी गहरा था। खासकर महिलाओं पर इस धारावाहिक ने बड़ा असर डाला। आज भी मैं कई ऐसी महिलाओं से मिलता हूं जो आईएएस, आईपीएस और विदेश सेवा जैसे महत्वपूर्ण पदों पर हैं, और वे मानती हैं कि 'उड़ान' ने ही उन्हें आगे बढ़ने और सिविल सर्विसेज की तैयारी करने की प्रेरणा दी।"
उन्होंने निष्कर्ष निकाला, "यही कारण है कि 'उड़ान' जैसे धारावाहिक आज भी प्रासंगिक हैं। उस समय का टेलीविजन मूल्यों से भरा हुआ था। कहानियों में संघर्ष, उम्मीद और दिशा थी। आज जब समाज में कई तरह की दरारें और तनाव हैं, तब हमें फिर से ऐसे कंटेंट की तलाश करनी चाहिए, जो लोगों को जोड़ सके और सही रास्ता दिखा सके।"