अगर आप भी बैंकिंग सेक्टर के शेयरों में दिलचस्पी रखते हैं, तो जल्द ही आपको एक बड़ा मौका मिल सकता है. दरअसल, केंद्र सरकार अब आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank) में अपनी हिस्सेदारी बेचने के लिए एक नया रास्ता अपनाने जा रही है. पिछले दिनों इस बैंक को पूरी तरह से निजी हाथों में सौंपने की एक बड़ी योजना सिरे नहीं चढ़ पाई थी. इसके बाद अब सरकार ‘ऑफर फॉर सेल’ यानी ओएफएस (OFS) का विकल्प तलाश रही है.
क्यों रद्द हुई पुरानी मेगा डील?इस नई योजना को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर सरकार को अचानक यह कदम क्यों उठाना पड़ा. इसी महीने की शुरुआत में, सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) ने मिलकर आईडीबीआई बैंक में अपनी 60.72 प्रतिशत की भारी-भरकम हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया था. इस मेगा बिक्री को लेकर बाजार में काफी हलचल थी. हालांकि, यह प्रस्तावित सौदा अचानक रद्द कर दिया गया. सूत्रों की मानें तो बैंक को खरीदने के लिए जिन दो बड़ी पार्टियों ने दिलचस्पी दिखाई थी, उनकी तरफ से लगाई गई वित्तीय बोलियां सरकार द्वारा तय किए गए न्यूनतम मूल्य (रिजर्व प्राइस) से काफी कम थीं. घाटे का सौदा न करते हुए सरकार ने उस बिक्री प्रस्ताव को वहीं रोक देना बेहतर समझा.
किसके पास है बैंक का ‘कंट्रोल’?आईडीबीआई बैंक की मौजूदा स्थिति काफी दिलचस्प है. यह एक ऐसा बैंक है जिसका नियंत्रण पूरी तरह से देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी एलआईसी के हाथों में है. आंकड़ों पर नजर डालें तो एलआईसी के पास बैंक की 49.24 प्रतिशत हिस्सेदारी मौजूद है और इसका पूरा कंट्रोल उसी के पास है. वहीं, भारत सरकार भी इसमें 45.48 प्रतिशत की एक बड़ी हिस्सेदार है. इन दोनों बड़े खिलाड़ियों के बीच आम जनता यानी सार्वजनिक हिस्सेदारी (पब्लिक शेयरहोल्डिंग) के लिए महज 5.29 प्रतिशत का ही हिस्सा बचता है. इतनी कम सार्वजनिक हिस्सेदारी के कारण ही बैंक से जुड़ी कई तकनीकी और व्यावहारिक दिक्कतें सामने आ रही हैं.
बाजार में हिस्सेदारी बढ़ने से आम निवेशक को क्या मिलेगा?अब सवाल उठता है कि सरकार ओएफएस लाकर बाजार में पब्लिक होल्डिंग क्यों बढ़ाना चाहती है और इससे आम आदमी का क्या लेना-देना है. दरअसल, जब किसी कंपनी में आम जनता की हिस्सेदारी (फ्री फ्लोट) बहुत कम होती है, तो उस शेयर की असली कीमत का अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है. आईडीबीआई बैंक के मामले में सिर्फ 5.29 प्रतिशत शेयर ही बाजार में आम लोगों के पास होने के कारण बैंक का सही मूल्यांकन यानी वैल्यूएशन नहीं हो पा रहा है.
अगर सरकार ओएफएस के जरिए इस हिस्सेदारी को बढ़ाकर 10 से 15 प्रतिशत तक ले जाती है, तो बाजार में बैंक के ज्यादा शेयर उपलब्ध होंगे. इससे शेयरों की खरीद-फरोख्त बढ़ेगी और मूल्य निर्धारण कहीं अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद हो सकेगा. इससे न सिर्फ आम निवेशकों को सही दाम पर शेयर खरीदने का मौका मिलेगा, बल्कि भविष्य में अगर सरकार इस बैंक की रणनीतिक बिक्री करना चाहेगी, तो उसे भी एक सही और स्पष्ट कीमत मिल सकेगी.
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