यादों में रेणुः 'मैला आंचल' के 'गुलफाम', समाज, साहित्य और सादगी को साधने वाले शब्दशिल्पी
Navjivan Hindi April 11, 2026 10:43 PM

हर साल की 11 अप्रैल कैलेंडर पर दर्ज सिर्फ एक तारीख नहीं है। यह तारीख उस आवाज की खामोशी का प्रतीक है जिसने गांव, खेत, गंध, लोक और मनुष्य के छोटे-छोटे सुख-दुख को शब्दों में ऐसा ढाला कि वे हमेशा के लिए जीवंत हो गए। साल 1977 में 11 अप्रैल को ही साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु का निधन हुआ था। इस दिन उनकी आवाज हमेशा के लिए खामोश जरूर हो गई, लेकिन उनकी लिखावट आज भी रंगमंच से लेकर लोगों के जीवन में उपस्थित है।

बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना गांव में 4 मार्च 1921 को जन्मे रेणु एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार से थे। पिता शिलानाथ और माता पानो देवी के सान्निध्य में उनका बचपन बीता। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अररिया और फारबिसगंज में हुई। मैट्रिक के बाद वे बनारस गए, लेकिन वहां अधिक समय नहीं टिक सके और वापस बिहार लौट आए। भागलपुर के एक कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनका झुकाव सक्रिय राजनीति की ओर हुआ और वे समाजवादी आंदोलन से प्रभावित हुए। 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में उन्होंने खुलकर भाग लिया और जेल भी गए।

भारत-नेपाल सीमा के पास जन्म लेने के कारण नेपाल की सशस्त्र क्रांति में भी उनकी गहरी रुचि रही। 1950 में नेपाल की एकतंत्रीय राजशाही के खिलाफ संघर्ष में उन्होंने विद्रोही सेना के साथ सक्रिय भूमिका निभाई और विद्रोहियों के ‘नेपाल रेडियो’ के प्रथम डायरेक्टर जनरल भी बने। वे लंबे समय तक कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे। 1952-53 के दौरान लंबी बीमारी ने उन्हें सक्रिय राजनीति से दूर कर दिया।

यही वह मोड़ था, जब उन्होंने साहित्य को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। हालांकि उनकी राजनीतिक सजगता अंतिम समय तक बनी रही और देश में आपातकाल का उन्होंने कड़ा विरोध किया। 1954 में प्रकाशित उनका पहला उपन्यास ‘मैला आंचल’ हिंदी साहित्य में एक मील का पत्थर साबित हुआ और यहीं से उनकी पहचान एक बड़े कथाकार के रूप में स्थापित हो गई।

फणीश्वरनाथ रेणु को हिंदी साहित्य में आंचलिक युग की स्थापना का श्रेय दिया जाता है। प्रेमचंद के समय से शुरू हुई आंचलिकता की प्रवृत्ति को उन्होंने अपने लेखन में पूर्ण विस्तार दिया। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन का जो गहन, रागात्मक और रसपूर्ण चित्रण मिलता है, वह हिंदी कथा-साहित्य में अद्वितीय है। उनकी भाषा-शैली, जिसमें लोकभाषा, बोली और जीवन की सादगी का सुंदर मेल है, ने साहित्य को एक नया आयाम दिया।

मैला आंचल' के बाद उनका उपन्यास 'परती परिकथा' और कहानी 'मारे गए गुलफाम' ने उनकी ख्याति को और विस्तार दिया। 'मारे गए गुलफाम' पर शोमैन राजकपूर अभिनीत प्रसिद्ध फिल्म 'तीसरी कसम' बनी। उन्होंने केवल उपन्यास और कहानियां ही नहीं लिखीं, बल्कि निबंध, रिपोर्ताज और संस्मरण जैसी गद्य विधाओं में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। रेणु के उपन्यास में मैला आंचल, परती परिकथा, जुलूस, पल्टू बाबू रोड, दीर्घतपा, कितने चौराहे शामिल हैं। वहीं, कहानी संग्रह में ठुमरी, एक आदिम रात्रि की महक, अग्निखोर, मेरी प्रिय कहानियां, एक श्रावणी दोपहरी की धूप, अच्छे आदमी शामिल हैं।

रेणु की चर्चित कहानियों की अगर हम बात करें तो उसमें मारे गए गुलफाम, एक आदिम रात्रि की महक, लाल पान की बेगम, पंचलाइट, तबे एकला चलो रे, ठेस और संवदिया का जिक्र विशेष रूप से किया जाता है। भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया और उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया गया। रेणु का साहित्य आज भी महसूस किया जाता है। उनकी कहानियों में बहती नदी, खेतों की हरियाली, लोकगीतों की गूंज और आम आदमी की पीड़ा सब जीवंत हैं।

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