अब आपकी धड़कन ही बन जाएगी आपका पासवर्ड, कैसे काम करेगी यह तकनीक?
एबीपी टेक डेस्क April 18, 2026 12:12 PM

VitalID: डिजिटल सिस्टम में लॉग-इन करने का तरीका जल्द ही बदलने वाला है. पासवर्ड और आई स्कैन जैसे तरीके अब पुराने हो गए हैं. एक नई टेक्नोलॉजी इनकी जगह ले सकती है, जिसमें आपके दिल की धड़कन पासवर्ड के तौर पर काम करेगी. यह टेक्नोलॉजी आपके सिर में होने वाली हल्की वाइब्रेशन से यूजर की पहचान कर लेगी. Rutgers University ने इस सिस्टम को डेवलप किया है, जिसे VitalID कहा जा रहा है. यह आपकी सांसों और हार्टबीट से मिले सिग्नल्स से आपकी पहचान कर सकता है. आइए जानते हैं कि VitalID सिस्टम काम कैसे करेगा और इसकी जरूरत क्यों पड़ी.

कैसे काम करेगा VitalID सिस्टम?

यह सिस्टम शरीर के अंदर होने वाले छोटे से छोटे वाइब्रेशन को डिटेक्ट कर सकता है. हर सांस और धड़कन से हल्की-सी वाइब्रेशन होती है, जो गर्दन तक होते हुए खोपड़ी में पहुंचती है. अब चूंकि हर इंसान की खोपड़ी अलग होती है, ये वाइब्रेशन थोड़ी-थोड़ी चेंज होती रहती है. इस कारण हर इंसान में यूनीक वाइब्रेशन पैटर्न बनता है. आजकल बाजार में मौजूद XR हेडसेट्स में मोशन सेंसर लगे होते हैं. ये इतने सेंसेटिव होते हैं कि खोपड़ी में होने वाली हल्की वाइब्रेशन को भी डिटेक्ट कर लेंगे. VitalID सिस्टम एक सॉफ्टवेयर की मदद से वाइब्रेशन के पैटर्न को एनालाइज कर यूजर की आइडेंटिटी कन्फर्म कर देगा. इसके लिए किसी भी एक्स्ट्रा डिवाइस की जरूरत नहीं पड़ेगी. टेस्टिंग के दौरान इस सिस्टम ने 95 प्रतिशत सटीकता के साथ यूजर को वेरिफाई किया. यह अनऑथोराइज्ड यूजर्स का भी पता लगाने में एकदम कामयाब रहा. 

क्यों पड़ी VitalID सिस्टम की जरूरत?

पिछले कुछ समय से एक्सटेंडेड रिएलिटी (XR) का यूज बढ़ा है. वर्चुअल रिएलिटी, ऑग्मेंटेड रिएलिटी और मिक्स्ड रिएलिटी को मिलाकर एक्सटेंडेट रिएलिटी बनती है. अब यह सिर्फ गेमिंग में यूज नहीं हो रही. लोग अब XR सिस्टम को काम, एजुकेशन, हेल्थकेयर और फाइनेंशियल सर्विसेस तक में यूज कर रहे हैं. ऐसे में इसकी सिक्योरिटी भी जरूरी हो गई है. XR सिस्टम में पासवर्ड जैसे ट्रेडिशनल लॉग-इन सिस्टम ठीक तरीके से काम नहीं करते. इसके अलावा सिक्योरिटी के लिए टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन जैसे तरीके भी यूजर एक्सपीरियंस खराब कर सकते हैं. इन सब चुनौतियों को देखते हुए VitalID सिस्टम की जरूरत पड़ी है.

यह है VitalID सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा

इस सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे अनऑथोजाइज्ड एक्सेस बंद हो जाएगी. कोई भले ही दूसरे इंसान के सांस लेने के पैटर्न की कॉपी कर ले, लेकिन उसकी खोपड़ी की स्ट्रक्चर और टिश्यू की नकल करना असंभव है. स्ट्रक्चर और टिश्यू से ही वाइब्रेशन को अलग-अलग शेप मिलती है. रिसर्च टीम ने फिलहाल इसके लिए पेटेंट दायर कर दिया है.

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