Parashuram Jayanti Significance: भगवान परशुराम की जयंती आज मनाई जा रही है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब-जब पृथ्वी पर पाप और अन्याय की सीमा पार हुई है, तब-तब भगवान विष्णु ने विभिन्न रूपों में अवतार लिया है. इसी कड़ी में वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भार्गव वंश के ऋषि जमदग्नि और मां रेणुका के घर पांचवें पुत्र के रूप में विष्णु जी के छठे अंश का जन्म हुआ. उनका जन्म केवल एक संयोग नहीं, बल्कि पृथ्वी को अत्याचारी राजाओं के बोझ से मुक्त कराने का एक ईश्वरीय विधान था.
परशुराम जी को सात अमर पुरुषों यानी ‘चिरंजीवी’ में गिना जाता है, जो आज भी महेंद्र पर्वत पर तपस्या में लीन माने जाते हैं. उनका व्यक्तित्व हमें साहस और शांति के संतुलन की अद्भुत सीख प्रदान करता है.
परशुराम ने किया कठोर तपपुराणों में वर्णन मिलता है कि बचपन में उनका नाम राम था, लेकिन उनकी अटूट श्रद्धा और कठोर अनुशासन ने उन्हें महादेव का प्रिय बना दिया. उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हिमालय की कंदराओं में कई वर्षों तक अत्यंत कठिन तपस्या की. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान प्रदान किया. शिव जी ने ही उन्हें अपना शक्तिशाली फरसा यानी ‘परशु’ भेंट किया था, जिसे धारण करने के बाद वे राम से ‘परशुराम’ कहलाए. यह शस्त्र केवल युद्ध के लिए नहीं, बल्कि समाज में न्याय की रक्षा और अधर्म के विनाश का प्रतीक बना. परशुराम जी ने इसी शस्त्र के माध्यम से आततायी शक्तियों का अंत किया और ऋषियों की तपस्या को सुरक्षित बनाया.
अधर्म के नाश के लिए परशुराम ने लिया अवतारविष्णु पुराण और महाभारत के अनुसार, उस काल में हैहय वंश के राजा कार्तवीर्य अर्जुन का आतंक चरम पर था. उसने अपनी शक्ति के मद में आकर ऋषि जमदग्नि की प्रिय कामधेनु गाय का अपहरण कर लिया और आश्रम को तहस-नहस कर दिया. जब परशुराम जी को इस अन्याय का पता चला, तो उन्होंने अकेले ही उस विशाल सेना का सामना किया और राजा का वध कर दिया. इसके बाद जब अन्य राजाओं ने मर्यादाओं का उल्लंघन किया, तो उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को अत्याचारी क्षत्रियों से मुक्त कराकर धर्म की मर्यादा स्थापित की. यह अवतार हमें सिखाता है कि जब शांति के सभी मार्ग बंद हो जाते हैं, तब शस्त्र उठाना ही धर्म की रक्षा का अंतिम और अनिवार्य मार्ग बन जाता है.
परशुराम ने दिया शक्ति के साथ सहजता का संदेशभगवान परशुराम केवल एक शक्तिशाली योद्धा ही नहीं थे, बल्कि उनके भीतर एक महान त्यागी और विद्वान ब्राह्मण का हृदय भी बसता था. पूरी पृथ्वी को जीतने के बाद भी उनके मन में राज-पाट का कोई लालच नहीं आया, बल्कि उन्होंने अपनी जीती हुई सारी भूमि ऋषि कश्यप को दान कर दी. उनका यह फैसला हमें सिखाता है कि शक्ति का असली मकसद धन जमा करना नहीं, बल्कि दूसरों का भला और सेवा करना है. आज भी हम उनकी जयंती पर उनके ज्ञान और साहस को याद करते हैं, ताकि हमारे जीवन में भी वही निडरता और दया का भाव आ सके. उनकी कहानी हमें अनुशासन के साथ जीना और हर हाल में शांत रहना सिखाती है. उनका जीवन आज भी हमें सही रास्ते पर चलने और न्याय का साथ देने की प्रेरणा देता है.
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