जिनके एक ही वार से अखाड़े में चित हो जाते थे 12 लोग… बुंदेलखंड के शौर्य भगवानदास रैकवार का निधन, 4 महीने बाद मिलना था पद्मश्री सम्मान
TV9 Bharatvarsh April 19, 2026 01:43 PM

बुंदेलखंड के शौर्य और प्राचीन युद्ध कला अखाड़ा के वैश्विक ध्वजवाहक भगवानदास रैकवार ‘दाऊ’ अब हमारे बीच नहीं रहे. 83 वर्ष की आयु में सागर के इस जांबाज कलाकार ने शनिवार देर रात भोपाल के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली. विडंबना ये रही कि जिस पद्मश्री सम्मान की घोषणा इसी साल 25 जनवरी को हुई थी और जो उन्हें 26 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति के हाथों मिलना था, उसे ग्रहण करने से पहले ही ‘दाऊ’ पंचतत्व में विलीन हो गए.

2 जनवरी 1944 को सागर के एक साधारण परिवार में जन्मे भगवानदास रैकवार का जीवन संघर्षों की जीती-जागती मिसाल था. उनके पिता गोरेलाल रैकवार एक उद्योगपति के यहां घरेलू काम करते थे. दो भाइयों में सबसे बड़े भगवानदास ने 10वीं तक शिक्षा प्राप्त की और उसके बाद स्टेट बैंक में रिकॉर्ड कीपर के तौर पर सरकारी नौकरी भी की.

कला की खातिर छोड़ी सरकारी नौकरी

1964 में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उनकी जिंदगी बदल दी. अपनी माटी की लुप्त होती ‘बुंदेली मार्शल आर्ट’ को बचाने के जुनून में उन्होंने सुरक्षित सरकारी नौकरी को लात मार दी. अपने गुरु राम चरण रावत के मार्गदर्शन में उन्होंने ऐतिहासिक ‘छत्रसाल अखाड़े’ की कमान संभाली और तलवार, भाला, त्रिशूल और लाठी चलाने की कला को अपना जीवन समर्पित कर दिया.

वैश्विक पटल पर बुंदेली शौर्य का प्रदर्शन

दाऊ ने केवल अखाड़े तक खुद को सीमित नहीं रखा. उन्होंने भारतीय शस्त्र कला की धाक रूस, अमेरिका और सिंगापुर जैसे देशों में जमाई. उन्होंने करीब 20 हजार से अधिक छात्र-छात्राओं को आत्मरक्षा के गुर सिखाए. दाऊ ने देश-दुनिया के 1000 से अधिक मंचों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया.

वे अक्सर कहते थे कि लाठी चलाने की तकनीक जानने वाला अकेला व्यक्ति 12 लोगों से मुकाबला कर सकता है. उनके लिए यह कला महाराणा प्रताप और रानी लक्ष्मीबाई की विरासत थी. वो खुद भी अखाड़े में एक ही वार में 12 लोगों को चित कर देने का हुनर रखते थे.

बीमारी से जंग और अंतिम समय

भगवानदास रैकवार पिछले काफी समय से श्वास संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे. 17 मार्च से उनकी तबीयत ज्यादा बिगड़ी, जिसके बाद 7 अप्रैल को उन्हें सागर से भोपाल (AIIMS) रेफर किया गया था, जहां वे वेंटिलेटर पर थे. उनके निधन की खबर से समूचे बुंदेलखंड में शोक की लहर दौड़ गई है. सागर ने पिछले साल राई नृत्य के स्तंभ रामसहाय पांडे को खोया था और अब रैकवार के जाने से सांस्कृतिक जगत को अपूरणीय क्षति हुई है.

राजकीय सम्मान और श्रद्धांजलि

मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल, राज्यमंत्री लखन पटेल और पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है. उपमुख्यमंत्री ने उन्हें एक महान प्रेरणास्रोत बताया है. आज उनकी अंतिम यात्रा सागर के रामपुरा वार्ड स्थित छत्रसाल अखाड़े से निकलेगी. उनकी इस विरासत को अब उनके पुत्र राजकुमार रैकवार आगे बढ़ा रहे हैं.

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