सरकारी बैंकों पर RBI की 'कड़ी नजर'! ECL नियमों की आहट से टूटे SBI और BoB के शेयर
TV9 Bharatvarsh April 28, 2026 04:44 PM

मंगलवार यानी 28 अप्रैल को सरकारी बैंकों के शेयरों में भारी गिरावट देखने को मिली. ये गिरावट बैंकिंग रेगुलेटर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के एक फैसले के बाद आई है. आरबीआई ने पुष्टि की है कि वह 1 अप्रैल, 2027 से ‘एक्सपेक्टेड क्रेडिट लॉस’ (ECL) फ्रेमवर्क को लागू करेगा. इसका डर बैंकों में काफी दिनों से था. यह समय सीमा बाजारों के लिए एक झटका थी, जो ज्यादा ढील वाली समय सीमा की उम्मीद कर रहे थे, और इसने निवेशकों को अपने शेयर बेचने के लिए मजबूर कर दिया. इस फैसले के बाद बैंक ऑफ इंडिया और बैंक ऑफ बड़ौदा के शेयरों में सबसे ज्यादा की गिरावट देखने को मिली. दोनों के शेयरों में 3 फीसदी की गिरावट आई. केनरा बैंक 2 फीसदी गिरा, और देश के सबसे बड़े बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) में 1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

बैंकों की नेटवर्थ हो सकती है कम

सरकारी बैंकों (PSU) के लिए इस नुकसान का पैमाना काफी बड़ा हो सकता है. मैक्वेरी के अनुसार, PSU बैंकों की नेटवर्थ में एक बार में 5 फीसदी से 10 फीसदी तक की कमी आने की संभावना है. ब्रोकरेज फर्म ने यह भी बताया कि PSU बैंकों के लिए क्रेडिट कॉस्ट 20 से 25 बेसिस पॉइंट्स तक बढ़ सकती है. मैक्वेरी ने इन नए नियमों को केवल उन बैंकों के लिए फायदेमंद बताया जिनका होम लोन में ज्यादा हिस्सा है, जबकि जिन बैंकों के 30-90 दिनों से ज्यादा समय से बकाया लोन (खासकर बिना गारंटी वाले लोन, माइक्रोफाइनेंस और वाहन फाइनेंस में) का हिस्सा ज्यादा है, और आम तौर पर सभी सरकारी बैंकों को, इसका सबसे ज़्यादा बुरा असर झेलना पड़ सकता है.

पहले ये लगाया गया था अनुमान

हर कोई इस नुकसान को एक ही नजर से नहीं देख रहा है. अक्टूबर में ड्राफ्ट नियम जारी होने के बाद आई एक रिपोर्ट में, मूडीज ने इसके असर को ज्यादा सीमित बताया था. मूडीज के विश्लेषकों ने कहा कि हमें उम्मीद है कि इन प्रस्तावित नियमों से बैंकों की ‘टैंजिबल कॉमन इक्विटी’ में 50-80 बेसिस पॉइंट्स की कमी आएगी. चूंकि इसे चार साल की अवधि में धीरे-धीरे लागू किया जाएगा, जिससे बैंकों को पहले ही दिन पूंजी में बड़ी कटौती से बचने का मौका मिलेगा, इसलिए ज्यादा बैंक डिविडेंड के भुगतान में ज्यादा सावधानी बरतकर कैपिटल रेश्यो में आई इस गिरावट को संभाल लेंगे.

आरबीआई फैसले से टूटी उम्मीदें

सोमवार को RBI के ECL फ्रेमवर्क को आगे बढ़ाने के फैसले से उन उम्मीदों पर पानी फिर गया कि बैंकों को नियमों के पालन के लिए ज्यादा ढील वाला समय दिया जाएगा. यह बदलाव मौजूदा ‘इनकर्ड-लॉस प्रोविजनिंग मॉडल’ की जगह लेगा. इस पुराने मॉडल के तहत, बैंक तभी प्रोविजन (पूंजी का इंतजाम) करते थे जब असल में कोई नुकसान हो जाता था, जबकि नया मॉडल एक ‘भविष्य-उन्मुखी’ (forward-looking) दृष्टिकोण अपनाता है, जिसके तहत बैंकों को संभावित क्रेडिट नुकसान के आधार पर पहले से ही पूंजी का बफर (सुरक्षा कवच) तैयार करना होगा.

किस तरह के होंगे बदलाव

नए फ्रेमवर्क के तहत, बैंक असेट क्लासिफिकेशन (संपत्ति के वर्गीकरण) के लिए एक “स्टेजिंग फ्रेमवर्क” अपनाएंगे. इसके तहत, मुश्किल में पड़े (stressed) लोन के लिए ज्यादा प्रोविजन करना होगा और ‘प्रभावी ब्याज दर पद्धति’ (effective interest rate method) का इस्तेमाल करना होगा. केंद्रीय बैंक ने कहा कि इस बड़े बदलाव का मकसद पूरे बैंकिंग सेक्टर में मजबूती, पारदर्शिता और एकरूपता लाना है.

सबसे अहम बात यह है कि RBI ने पुष्टि की है कि वह नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) को क्लासिफाई करने के लिए मौजूदा 90-दिनों के ओवरड्यू नियम को बनाए रखेगा. इससे लेंडर्स को कम से कम कुछ हद तक निरंतरता मिलेगी, भले ही उनके लिए प्रोविजनिंग का पूरा ढांचा बदल रहा हो. नए नियमों में बदलाव से बैंकों के कैपिटल एडिक्वेसी रेश्यो पर असर पड़ने की उम्मीद है. इससे 2027 की ओर बढ़ते हुए डिविडेंड पॉलिसी, कैपिटल प्लानिंग और लोन बुक की बनावट के बारे में बोर्डरूम में होने वाली बातचीत में और तेजी आएगी.

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