इजरायल के हर्जलिया शहर के एक होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई गई. दो पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और यैर लैपिड एक साथ मंच पर आए. दोनों ने ऐलान कर दिया, 'अब हम एक साथ चुनाव लड़ेंगे, हमारी नई पार्टी नाम टुगेदर होगा और हमारा एक ही मकसद है- बेंजामिन नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करना.' यह वही बेनेट और लैपिड हैं जिन्होंने 2021 में मिलकर नेतन्याहू की 12 साल पुरानी सत्ता को उखाड़ फेंका था. लेकिन गठबंधन टूटने की वजह से 2021 में नेतन्याहू वापिस आ गए. अब फिर से वही जोड़ी और वही मिशन. लेकिन क्या इस बार वे कामयाब होंगे और क्या नेतन्याहू जंग करवाकर भी कुर्सी नहीं बचा पाएंगे, जानेंगे एक्सप्लेनर में...
सवाल 1: बेनेट और लैपिड ने नेतन्याहू के खिलाफ क्या प्लान बनाया है?
जवाब: यह प्लान अचानक नहीं, बल्कि मजबूरी और रणनीति के तहत बना है. दरअसल, इजरायल में अक्टूबर 2027 में चुनाव होने हैं, लेकिन अटकलें हैं कि नेतन्याहू इसी साल अक्टूबर में जल्दी चुनाव करा सकते हैं. ऐसे में विपक्ष एकजुट हो रहा है. 26 अप्रैल 2026 को नफ्ताली और बैनेट ने अपनी-अपनी पार्टियों का विलय कर एक नई पार्टी बनाने का ऐलान किया है. इसका नाम 'टुगेदर' होगा. दोनों पार्टियों के पास वर्तमान (संसद) में कुल 24 सीटें हैं, जिनमें बेनेट के पास 17 और लैपिड के पास 7 हैं.
2021 में भी दोनों ने साथ मिलकर 'चेंज गवर्नमेंट' बनाई थी, जिसने नेतन्याहू की सत्ता को खत्म कर दिया था. उस समय पहले बेनेट प्रधानमंत्री बने, फिर लैपिड को यह पद संभालना था लेकिन गठबंधन टूट गया. इस बार लैपिड ने बेनेट के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया है. द टाइम्स ऑफ इजरायल के मुताबिक, अकेले चुनाव लड़ने पर लैपिड की पार्टी सिर्फ 5-7 सीटों पर सिमट सकती है, जबकि बैनेट को 20 से ज्यादा सीटें मिल सकती हैं. ऐसे में अस्तित्व बचाने के लिए लैपिड को यह कदम उठाना ही पड़ा है. उन्होंने गादी आइजनकोट को भी शामिल होने का निमंत्रण दिया है.
हालांकि, दोनों नेताओं की सोच में काफी अंतर है, जो इस गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती और कमजोरी भी है.
सवाल 2: क्या गादी आइजनकोट और बेनी गैंट्ज जैसे नेता भी साथ आएंगे?
जवाब: यहीं पर सबसे बड़ा उलटफेर हुआ है. पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट इस गठबंधन की कुंजी बनकर उभरे हैं. आइजनकोट 2015-19 तक इजरायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) के प्रमुख रहे हैं और सुरक्षा मामलों में उनकी अहमियत है. वह पहले बेनी गैंट्ज की नेशनल यूनिटी पार्टी में थे, लेकिन अब अलग पहचान बना रहे हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि सुरक्षा और सेना के मुद्दों पर उनकी मजबूत छवि के कारण दक्षिपंथी वोटर अब आइजनकोट की ओर जा रहे हैं.
इजरायली टीवी चेनल 12 के सर्वे के मुताबिक, बेनेट ने आइजनकोट को गठबंधन में शामिल होने का न्योता दिया है, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है. अगर तीनों साथ आ जाते हैं, तो सर्वे में इन्हें करीब 41 सीटें मिलने का अनुमान है, जो सबसे बड़ा दल बन जाएगा. इजरायल की संसद में 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का बहुमत चाहिए.
सवाल 3: क्या सचमुच नेतन्याहू की सत्ता खतरे में है?
जवाब: हां, यह सबसे नाजुक सवाल है. ताजा सर्वे बता रहे हैं कि नेतन्याहू की गठबंधन सरकार पहली बार सच्चे खतरे में है, लेकिन हालात उतने साफ नहीं हैं जितने लगते हैं:
ब्लॉक समीकरण की मानें तो सरकार को बहुमत (61 सीटें) चाहिए. अभी चैनल 12 और चैनल 13 के सर्वे बता रहे हैं कि नेतन्याहू का गठबंधन 49-57 सीटों के बीच है, यानी बहुमत से दूर. विपक्ष (जायोनी) 52-60 सीटों के बीच है, वे भी अकेले बहुमत में नहीं हैं. अरब पार्टियों के पास 10 सीटें हैं. विपक्ष को 61 तक पहुंचने के लिए या तो अरब पार्टियों का साथ चाहिए, या फिर दक्षिणपंथी दलों का. हालांकि, बेनेट ने साफ कह दिया है कि वे अरब पार्टियों के साथ गठबंधन नहीं करेंगे. यही चीज उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि अरब पार्टियों के बिना उनके लिए 61 सीटें जुटाना लगभग नामुमकिन है. नेतन्याहू के खिलाफ निगेटिविटी का भी बड़ा रोल है:
सवाल 4: नेतन्याहू ने PM की कुर्सी पर बैठे रहने के लिए क्या-क्या किया?
जवाब: बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के इतिहास में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे हैं. सत्ता में बने रहने के लिए उन्होंने कई ऐसे कदम उठाए हैं, जिनपर गंभीर सवाल उठे:
एक INSS सर्वे बताता है कि युद्ध की शुरुआत में 69% इजरायलियों का मानना था कि ईरानी शासन को 'भारी नुकसान' पहुंचाया गाएगा, लेकिन अब सिर्फ 30.5% लोग ही ऐसा मानते हैं.
सवाल 5: तो क्या जंग करवाकर भी नेतन्याहू कुर्सी नहीं बचा पाएंगे?
जवाब: बेंजामिन नेतन्याहू ने 7 अक्टूब 2023 को गाजा में हमला किया और कुछ ही महीनों में पूरा गाजा तबाह कर दिया. हमास को टारगेट करने के बहाने मुस्लिम पुरुष, महिलाओं और बच्चों तक को चुन-चुनकर मार दिया. फिर 28 फरवरी 2026 को 'ऑपरेशन रोअरिंग लॉयन' के तहत ईरान पर हमला किया. 8 अप्रैल 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता से संघर्ष विराम लागू हुआ. लेकिन यह सीजफायर बहुत नाजुक है. नेतन्याहू ने जंग तो लड़वा दी, लेकिन जीत का कोई साफ नतीजा लोगों के सामने नहीं रखा. इसके अलावा लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ लड़ाई जारी रखी.
जंग की शुरुआत में तो जनता नेतन्याहू के पीछे इकट्ठा हुई, लेकिन अब हालात बदल गए हैं. जनता को लगने लगा है कि यह कभी न खत्म होने वाला युद्ध है. चैथम हाउस की रिपोर्ट के मुताबिक, जनता युद्ध के उद्देश्यों का समर्थन करती है, लेकिन सरकार की निर्णायक अंत-स्थिति देने में असमर्थता से तंग आ चुकी है. लेकिन तीन बातें तय हैं: