नाम जप करते हैं तो बिल्कुल भी न करें ये अपराध, वरना नहीं मिलेगा फल, प्रेमानंद ने बताई ये गलतियां
Newshimachali Hindi April 30, 2026 08:42 AM

Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj: आज के समय में हर कोई भगवान की कृपा पाने से लेकर मन की शांति और सही मार्ग में चलने के लिए गुरु से दक्षिणा लेने के साथ नाम जप आरंभ कर देते हैं।

आमतौर पर साधक बस नाम जप करते हैं। लेकिन इसके साथ के कुछ नियमों को अनदेखा कर देते हैं। प्रेमानंद महाराज जी ने नाम जप करने के बेहतरीन फलों के बारे में बताया है। उन्होंने कहा कि सिर्फ नाम जप करने से आप जीवन के हर एक सुख को प्राप्त कर सकते है। ऐसे ही प्रेमानंद गोविंद शरण महाराज का एक वीडियो यूट्यूब में उनके ऑफिशियल अकाउंट भजन मार्ग में है। जिसमें उन्होंने ऐसे 10 अपराधों के बारे में बताया है जिन्हें नाम जप करने वालों को बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। आइए जानते हैं इन नाम जप अपराधों के बारे में…

प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि अगर हम नाम-जप करते हैं तो सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि नाम जपते समय जिन 10 नाम-अपराधों का उल्लेख शास्त्रों में किया गया है, उनसे अवश्य बचना चाहिए। नाम ही सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाला है और नाम जप से भगवान की प्राप्ति भी निश्चित है। लेकिन ये 10 अपराध जीवन में उपस्थित हैं तो नाम फलदायी नहीं होता और साधक यह सोचकर भ्रमित हो जाता है कि इतने दिनों से नाम जप कर रहा हूं पर लाभ नहीं मिला। इसलिए निवेदन है कि नाम जप कम भी हो पर इन अपराधों से रहित हो।

नाम जप करते हैं ये न करें ये 10 अपराध

संत पुरुषों की निंदा

नाम किसी संत, महापुरुष या गुरु परंपरा के माध्यम से ही मिलता है। इसलिए संतों की निंदा करना नाम-साधना का सबसे बड़ा अपराध माना गया है। परदोष दर्शन (दूसरों का दोष देखना), परदोष श्रवण (दूसरों की निंदा सुनना) और परदोष कथन (निंदा करना) यानी ये तीनों नाम की शक्ति को क्षीण कर देते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि संत निंदा से जन्मों-जन्मों के संचित पुण्य भी नष्ट हो जाते हैं और साधक की साधना प्रभावित होती है।

भगवान शिव और भगवान विष्णु में भेद करना

भगवान शिव और विष्णु जी दोनों ही एक ही परम तत्व के स्वरूप माने गए हैं। इनके बीच भेद करना या आपसी विरोध मानना महापाप कहा गया है। शैव वैष्णव की और वैष्णव शैव की निंदा करे, तो वह व्यक्ति नाम साधना में प्रगति नहीं कर पाता। ये दोनों ही भगवान के दो रूप हैं, इसलिए इनमें द्वेष रखना नाम-जप की सिद्धि में बाधक है।

गुरु का अपमान या अवज्ञा करना

प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि गुरु का स्थान देवताओं से भी ऊंचा बताया गया है। गुरु ही नाम देते हैं और मोक्ष का द्वार खोलते हैं। इसलिए गुरु का अनादर होने पर साधक कितना भी नाम जपे, फल प्राप्त नहीं होता। गुरु की निंदा, उनकी आज्ञा का पालन न करना या अहंकार के कारण उनकी बात को अनदेखा करना, नाम-साधना का बड़ा दोष है।

किसी भी वेद, शास्त्र, पुराण या संतवाणी की निंदा करना

प्रेमानंद महाराज ने चौथे अपराध के बारे में बताते हुए कहा कि हर ग्रंथ का उद्देश्य साधक को सत्य की ओर ले जाना है। अलग-अलग साधकों के लिए भिन्न-भिन्न मार्ग हैं। किसी एक ग्रंथ को श्रेष्ठ और दूसरे को निकृष्ट कहना या आलोचना करना नाम-साधना के लिए घातक माना गया है। शास्त्रों की निंदा करने से नाम की शक्ति निष्फल हो जाती है।

भगवान के नाम की महिमा असीम है यह कल्पना नहीं, सत्य है। यदि साधक यह सोचता है कि 'नाम इतना शक्तिशाली कैसे हो सकता है या 'यह तो बस बढ़ा-चढ़ा कर कहा गया है', तो यह अपराध माना गया है। नाम की महिमा पर संदेह साधक के मन में दृढ़ता और भक्ति को कम कर देता है।

नाम के बल पर पाप करना

प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि यह सोचना कि मैं दिनभर पाप करूं और रात को नाम जप कर सब मिटा दूंगा। यह घोर महापाप है। ऐसा भाव रखने से नाम-सिद्धि दूर होती जाती है। भगवान का नाम लोभ, ढोंग या पाखंड के आधार पर नहीं, बल्कि शुद्ध हृदय से जपा जाता है।

यज्ञ, दान, तप, व्रत आदि को नाम के समान या उससे श्रेष्ठ मानना

सभी शास्त्रों में नाम को सर्वोपरि साधन बताया गया है। यज्ञ, दान या तप कितना भी महान हो, परंतु नाम के समान नहीं हो सकता। नाम भगवान से भी श्रेष्ठ कहा गया है, इसलिए अन्य साधनों को नाम से ऊपर रखना अपराध है। इन साधनों का फल सीमित है, पर नाम का फल असीम और अनंत है।

पैसे के लोभ से या अनिच्छुक व्यक्ति को जबरदस्ती नाम का उपदेश करना

नाम उपदेश केवल योग्य और इच्छुक व्यक्ति को ही दिया जाना चाहिए। यदि कोई गुरु या व्यक्ति पैसे, लोभ, अभिमान या स्वार्थवश किसी को नाम देता है, या किसी अनिच्छुक व्यक्ति पर नाम-जप थोपता है, तो यह नाम-अपराध माना गया है। नाम दीक्षा पवित्र भाव का विषय है, व्यापार का नहीं।

नाम की महिमा सुनकर भी नाम जप का नियम न लेना और उपेक्षा करना

यदि व्यक्ति बार-बार नाम की महिमा सुनता है और फिर भी आलस्य, लापरवाही या उपेक्षा के कारण नाम-जप का नियम नहीं अपनाता, तो यह भी अपराध माना गया है। नाम सुनकर भी नाम न जपना, साधक को आध्यात्मिक रूप से पीछे ले जाता है। नाम तभी फलित होता है जब निरंतरता और निष्ठा हो।

सत्संग और नाम-महिमा सुनने के बाद भी अहंकार, विषय-भोग और ‘मैं-मेरा’ की प्रवृत्ति न छोड़

सत्संग का उद्देश्य मन को बदलना है। यदि व्यक्ति भगवान की महिमा सुनता है पर अपने व्यवहार, स्वभाव और जीवन में कोई परिवर्तन नहीं लाता, तो यह भी नाम-अपराध है। अहंकार, क्रोध, वासना, ईर्ष्या, द्वेष और भ्रम को पकड़े रखना नाम-साधना का बड़ा अवरोध है।

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