रोशनी गई तो नौकरी गई, पर हौसला नहीं…आंखें खोकर भी ज्ञान की लौ जलाए बैठे हैं डॉक्टर संतोष गोयल
TV9 Bharatvarsh May 03, 2026 04:42 AM

आपने गौर किया होगा कि जैसे ही कोई अच्छा पद मिलता है या सरकारी नौकरी लगती है, कुछ लोगों के बोलने-चलने का ढंग ही बदल जाता है. कुर्सी का रुतबा सिर चढ़कर बोलने लगता है और वो खुद को बाकियों से दो कदम ऊपर समझने लगते हैं. पर हकीकत ये है कि ये घमंड टिकता नहीं. जिंदगी का पहिया कब घूम जाए, कोई नहीं कह सकता. आज जो सबसे ऊपर है, कल वक्त उसे कहां ले जाए, पता नहीं. समय को पलटते देर नहीं लगती.

इसी सच को सामने लाता है डॉक्टर संतोष गोयल का वो वीडियो, जो इन दिनों हर फोन की स्क्रीन पर है. एक छोटी-सी मुलाकात, पर बड़ी सीख दे गई. वीडियो में जीएसटी के एडिशनल कमिश्नर अजय मिश्रा एक बुजुर्ग से बात कर रहे हैं. धीमी आवाज, सफेद कुर्ता, आंखों पर काला चश्मा. नाम है डॉक्टर संतोष गोयल. बातचीत में पता चलता है कि उन्होंने 1971 में अंग्रेजी में पीएचडी की थी. सोचिए, वो दौर जब पीएचडी करना किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं था.

हालात को दोष मत दो, रास्ता निकालो

इसके बाद तीन साल तक उन्होंने एनडीए, यानी नेशनल डिफेंस एकेडमी में पढ़ाया. देश के भविष्य को तैयार करने वाले जवानों को उन्होंने अंग्रेजी सिखाई, उनका मार्गदर्शन किया. उनके पढ़ाए कई छात्र आज फौज, प्रशासन और बड़े-बड़े ओहदों पर हैं. एक शिक्षक के लिए इससे बड़ी कमाई क्या होगी? कहते हैं न, समय सबसे बड़ा शिक्षक है. डॉक्टर गोयल की आंखों की रोशनी धीरे-धीरे साथ छोड़ गई. जो इंसान पूरी जिंदगी किताबों में डूबा रहा, शब्दों से खेलता रहा, आज उसी के लिए दुनिया में अंधेरा है.

वीडियो में वो बताते हैं कि रोशनी जाने के बाद उन्हें एनडीए छोड़ना पड़ा. सबसे ज्यादा चुभने वाली बात उन्होंने बहुत सहजता से कही अगर 15 साल और पढ़ा लेता, तो आज 70-80 हजार की पेंशन होती. ये सिर्फ पैसे का अफसोस नहीं है. ये उस सिस्टम की सच्चाई है जहां एक बीमारी, एक हादसा, आपकी पूरी जमा-पूंजी, आपका रुतबा, सब बदल सकता है.

आप सोचेंगे कि अब वो क्या करते होंगे? जवाब सुनकर गला भर आता है. डॉक्टर गोयल आज आगरा के एक मंदिर में रहते हैं. और वहां क्या करते हैं? पढ़ाते हैं. इंटर से लेकर एमए तक के बच्चे उनके पास आते हैं. बिना रोशनी के, सिर्फ याददाश्त और अनुभव के दम पर वो आज भी ज्ञान बांट रहे हैं. जो खुद अंधेरे में हैं, वो दूसरों के भविष्य में उजाला कर रहे हैं. इसे कहते हैं असली शिक्षक होना. पद गया, पेंशन नहीं मिली, आंखें चली गईं, पर पढ़ाने का जज्बा नहीं गया.

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ये सब सुनकर एडिशनल कमिश्नर अजय मिश्रा की आंखें भी नम हो गईं. कुर्सी पर बैठा अफसर और मंदिर में रहने वाला बुजुर्ग शिक्षक, उस पल दोनों सिर्फ इंसान थे. मिश्रा जी ने तुरंत अपना मोबाइल नंबर दिया और कहा कि कभी भी कोई जरूरत हो, बिना झिझक कॉल करिएगा. ये छोटा-सा कदम बहुत बड़ी बात कह गया. पद का असली मतलब यही है, कि जब जरूरत पड़े तो आप किसी के काम आ सकें.

यहां देखिए वीडियो

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